कुसुम्भी गांव स्थित माता कुशहरी देवी के मंदिर में नवरात्र भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्त की झोली मां भर देती हैं। इसी मान्यता के चलते आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में भक्त में यहां मां की उपासना करते हैं। साथ ही यहां नवरात्र पर विशाल मेला भी लगता है।
कुशहरी देवी को शक्तिपीठ का दर्जा हासिल है। जनश्रुति है कि माता कुशहरी देवी की मूर्ति की स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पुत्र कुश ने की थी। मंदिर से जुड़े लोग बताते हैं कि श्रीराम के सीता के परित्याग करने पर उनके आदेश पर सीता को रथ पर बैठाकर लक्ष्मण वन में छोड़ने के लिए रवाना हुए।
मार्ग में माता सीता को प्यास लगी तो उन्होंने लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा। लक्ष्मण ने एक कुएं से पात्र में जल लेने का प्रयास किया तो कुएं से आवाज आई कि पहले मुझे बाहर निकालो, फिर यहां से जल भरो। लक्ष्मण ने वैसा ही किया तो कुएं से एक देवी की मूर्ति निकली।
उस मूर्ति को उन्होंने कुएं के पास एक बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया और जल लेकर सीता के पास पहुंचे। उन्होंने इस बारे में सीता जी को भी बताया। इसके बाद गंगा तट पर रथ रोककर नाव से बिठूर के पास जंगल मेें पहुंचे। यहां आने के बाद सीता को बताया कि श्रीराम ने उन्हें त्याग दिया है।
सीता जी यह सुनकर दुखी हुईं और कहा अपने भाई से जाकर कहना कि वे गर्भवती हैं। यह सुनकर लक्ष्मण व्यथित हो गए। इसके बाद लक्ष्मण वापस अयोध्या लौट गए। वन में सीता का विलाप सुनकर वाल्मीकि आए और सीता को अपने साथ लेकर आश्रम चले गए।
वहां उन्हें ऋषि मुनियों की पत्नियों के साथ रहने का स्थान दिया। समय आने पर सीता को लव और कुश नामक दो पुत्र हुए। दोनों बालक महान पराक्रमी, धनुर्धर व रणकौशल में निपुण हुए। काफी दिनों बाद नैमिषारण्य धाम में श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया।
यज्ञ में भाग लेने के लिए वाल्मीकि ऋषि सीता व लव कुश को साथ लेकर चले। रास्ते मेें उसी स्थान को देखकर सीता जी को याद आया कि लक्ष्मण ने यहां एक देवी मूर्ति रखी थी। तब सीता ने कहा कुश इस देवी मूर्ति की स्थापना करो। कुश ने मां की आज्ञा का पालन कर देवी की स्थापना की।