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थाने से भगाया, कोर्ट ने मरहम लगाया

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उन्नाव। थानों की चौखट से दुत्कार और एसपी के दर पर फरियाद सुनाने के इंतजार में काफी समय से परेशान पीड़ितों को कोर्ट ने न्याय का मरहम लगाया है। खाकी ने जब नहीं सुनी तो कोर्ट ने पीड़ितों की सुनी। जिले में बीते एक साल में 167 मुकदमे कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज किए गए।
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मारपीट, चोरी, हत्या और लूट जैसी घटनाओं में पीड़ित मुकदमा दर्ज कराने और न्याय पाने के लिए सबसे पहले थाने पहुंचते हैं। थाने में सुनवाई न होने पर पीड़ित अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करते हैं। जहां पहले तो सीओ से न्याय की गुहार लगाई जाती है। सीओ के भी ध्यान न देने पर बात एएसपी और फिर एसपी तक पहुंचती है। थानों से लेकर एसपी की चौखट तक दौड़ लगाने के बाद कोई सुनवाई न होने पर पीड़ितों को कोर्ट की शरण लेने को मजबूर होना पड़ता है। जिले में ऐसे मामलों की भरमार है जिनमें कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही मुकदमा दर्ज किया जा सका। वर्ष 2013 में जिले के विभिन्न थानों में 167 ऐसे मुकदमे दर्ज किए गए जिनमें कोर्ट ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। जिन थानों में कोर्ट के आदेश के बाद मुकदमा दर्ज किया गया उनमें मौरावां और गंगाघाट सबसे आगे हैं। मौरावां थाने में कोर्ट के आदेश के बाद 35 मुकदमे दर्ज किए गए। वहीं गंगाघाट थाने में 25 मुकदमे कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दर्ज किए गए। इसी तरह सदर कोतवाली में 19, औरास में 13, बांगरमऊ में 11, आसीवन में 6, अजगैन में 7, अचलगंज में 4, असोहा में 6, बारासगवर में 2, बिहार में 4, फतेहपुर चौरासी में 5, हसनगंज में 2, मांखी में 7, पुरवा और सफीपुर में 5 मुकदमें कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज किए गए। पूरे जनपद में सोहरामऊ ऐसा थाना रहा जहां ऐसा कोई भी मुकदमा नहीं रहा जिसे दर्ज कराने के लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा हो।
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