सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस को कोई दबावकारी कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है।
लेखिका ट्विटर पर एक टिप्पणी करने के लिए आपराधिक आरोपों का सामना कर रही हैं। सर्वोच्च अदालत ने तस्लीमा की ओर से एफआईआर निरस्त करने की मांग पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब-तलब किया है।
यह प्राथमिकी दरगाह आला हजरत से जुड़े हसन रजा खान उर्फ नूरी मियां ने लेखिका की ओर से लिखी गई ट्विटर पोस्ट में धार्मिक भावनाओं के अपमान के संबंध में बरेली के कोतवाली थाने में दर्ज करायी है।
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जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि फिलहाल राज्य पुलिस कोई भी दबावकारी कार्रवाई नहीं करेगी।
तस्लीमा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने पीठ के समक्ष लेखिका के मानवाधिकार और उनके हितों के संरक्षण को लेकर संक्षिप्त तर्क पेश किए।
पीठ ने हालांकि यह साफ कर दिया कि एफआईआर को निरस्त करने के मुद्दे पर अदालत मौजूदा स्थिति में विचार नहीं कर सकती। साथ ही कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66ए को रद्द किए जाने की मांग वाली अन्य याचिकाओं के साथ लेखिका की याचिका को संबद्ध कर दिया जाए, जो पहले से अदालत में लंबित हैं।
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धारा 66ए में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समेत सोशल नेटवर्किंग साइटों पर की गई टिप्पणियों में अन्य की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने का प्रावधान है।
सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने कहा कि यह एफआईआर उस धार्मिक संस्था से जुड़े व्यक्ति की ओर से दायर करायी गई है जहां से जुड़े मौलाना तौकीर रजा ने मेरी मुवक्किल के खिलाफ सिर कलम करने वाले को इनाम का ऐलान किया था।
मौलाना तौकीर ने 2007 में महिलाओं के समर्थन में दिए गए उनके बयान पर लेखिका तसलीमा के सिर पर पांच लाख रुपये का ईनाम घोषित किया था।