सुल्तानपुर। किताबें केवल कागज का बंडल नहीं, बल्कि अनुभव और ज्ञान का वह अनमोल खजाना हैं जो हमें अतीत से जोड़ते हुए भविष्य की राह दिखाती हैं। विज्ञान, साहित्य और दर्शन को अपने भीतर समेटे पुस्तकें हर उम्र के व्यक्ति के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
हर वर्ष 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना और लेखकों के बौद्धिक अधिकारों (कॉपीराइट) के प्रति लोगों को जागरूक करना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि किताबें हमें अलग-अलग संस्कृतियों और महान विचारों से जोड़कर हमारी सोच को विस्तार देती हैं।
लेखक सर्वेशकांत वर्मा के अनुसार आज के डिजिटल युग में पढ़ने की आदत कम हो रही है, इसलिए इस दिन का महत्व और बढ़ गया है। स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं को पुस्तक क्लब और साहित्यिक गोष्ठियों के माध्यम से बच्चों में पढ़ने की रुचि फिर से जगानी चाहिए। साहित्यकार व शिक्षक अनिल कुमार मधुर का कहना है कि किताबें अकेलेपन की सच्ची साथी हैं और कठिन समय में सही रास्ता दिखाती हैं। यह दिवस ज्ञान और रचनात्मकता के सम्मान का प्रतीक है, जो हमें एक संवेदनशील समाज बनाने का संदेश देता है।
बचपन से ही किताबें पढ़ने की डालें आदत
जीआईसी के प्रधानाचार्य डॉ. मनोज कुमार तिवारी ने बताया कि बच्चों में पढ़ने की आदत बचपन से ही विकसित की जानी चाहिए। इसके लिए बच्चों को उनकी पसंद की किताबें चुनने की आजादी दें और उन्हें कहानियां सुनाएं। घर में पढ़ने के लिए एक शांत वातावरण तैयार करना जरूरी है। यदि परिवार के सदस्य खुद रोज कुछ समय किताबें पढ़ेंगे, तो बच्चे उन्हें देखकर स्वाभाविक रूप से प्रेरित होंगे।
किताबों के साथ अब अखबारों से बढ़ाएंगे ज्ञान
बीएसए उपेंद्र गुप्ता ने बताया कि जिले के परिषदीय स्कूलों में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में किताबें उपलब्ध कराने के साथ-साथ अब समाचार पत्र भी भेजे जा रहे हैं, ताकि बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित हो। कई स्कूलों में शिक्षकों ने व्यक्तिगत रुचि लेकर शानदार लाइब्रेरी तैयार की हैं। इन प्रयासों से बच्चों में न केवल पढ़ने की रुचि बढ़ी है, बल्कि उनके सर्वांगीण विकास में भी मदद मिल रही है।