सुल्तानपुर में भारतीय जनता पार्टी की जिला स्तरीय जनसभा शुरू होनी है। इसकी तैयारी लिए भाजपा के नेता और विधानसभा सीटों के प्रभारी जुटे हुए हैं, लेकिन आयोजकों से लेकर प्रमुख नेताओं के पास सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के आने या उनकी लोकेशन की कोई सूचना नहीं है। पूछने पर कहते हैं कि आ सकती हैं।
हालांकि उन्हें उम्मीद है कि सुल्तानपुर और अमेठी की आधी से अधिक सीटें भाजपा जीतेगी। आधी ही क्यों? इस सवाल पर कहते हैं कि कुछ तो सपा या विरोधियों को मिलेगी? फिर 300 पार के सवाल पर एक सन्नाटा छा जाता है। उत्तर यही मिलता है कि विधानसभा चुनाव 2017 से 2022 में बड़ा फर्क होगा। चुनाव में जातिगत समीकरण हावी होने शुरू हो गए हैं।
ज्ञानेश्वर शुक्ला भाजपा और संघ के पुराने नेता हैं। जिले की विधानसभा सीट के प्रभारी हैं। कई दिन से लगातार सुल्तानपुर में कैंप कर रहे हैं। शुक्ला के मुताबिक हर चुनाव में विरोधी भ्रम फैलाते हैं। प्रोपेगैंडा के बल पर नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि जनता को धीरे-धीरे सबकुछ समझ में आ जाता है। वह कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों में जमीनी स्तर पर माहौल तेजी से भाजपा के पक्ष में बदल गया है। जबकि सच्चाई यह है कि शुक्ला अपनी सफाई के बीच में बहुत कुछ छिपाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
भाजपा के बाद सपा का ही हवा, आखिर कुछ तो मतलब है?
पिछले कई विधानसभा चुनावों के नतीजे और माहौल को केंद्र में रखकर सुल्तानपुर, चांदा, लंभुआ से लेकर ढकवा तक या दोस्तपुर, मोतिगरपुर, बरौसा से लेकर सुल्तानपुर तक। मुंशीगंज, जगदीशपुर, मुसाफिरखाना तक हर बाजार में 10 में आठ-नौ मतदाताओं को लड़ाई केवल भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर दिखाई दे रही है। 1-2 मतदाता ही ऐसे मिलते हैं जो बड़ी मुश्किल से त्रिपक्षीय (बसपा) बताने की हिम्मत कर पा रहे हैं। कांग्रेस के मामले में सभी के मुंह से यही निकल रहा है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह है। प्रिंयका गांधी बहुत जोर-शोर से प्रयास कर रही हैं।
क्या कहते हैं यहां के लोग?
शांतनु यादव पेशे से शिक्षक हैं। उन्हें लगता है कि चुनाव के द्विपक्षीय होने का सपा को लाभ मिलेगा। भाजपा घाटे में रहेगी। जबकि भाजपा और आरएसएस से जुड़े संजय सिंह का कहना है कि सरकार भाजपा की ही बनेगी। आरएसएस का अनुशांगिक संगठन प्रज्ञा प्रवाह है। सामाजिक राजनीतिक अभियान में सक्रिय है। इससे जुड़े विनय कुमार का कहना है कि नतीजों के बाद सबकुछ पता चल जाएगा। विनय कुमार के मुताबिक बसपा प्रमुख मायावती भाजपा का विरोध भले करें, लेकिन वह खुद कह चुकी हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य सपा को हराना है। क्या मायावती भाजपा की एजेंट बन जाएंगी? विनय कुमार कहते हैं आप इसे समझ सकते हैं। वह कहते हैं कि पूरे उ.प्र. में आगे जहां भी जाइएगा, आपको इसी तरह के संदेश मिलेंगे।
लोहरामऊ में दिनेश जैसवार की गाड़ी पर जय भीम और बसपा का झंडा लगा है। बातचीत में दिनेश को यह मान लेने में कोई गुरेज नहीं है कि बसपा प्रमुख मायावती ने पिछले कुछ महीने में खुद ही उ.प्र. में अपने पैर तोड़ लिए हैं। भाई चारा बनाओ जैसी सभी जातियों की समितियां सक्रिय हैं, लोकिन अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। हालांकि सिद्धार्थ अंबेडकर का कहना है कि सब भाजपा और उसकी मशीनरी का फैलाया दुष्प्रचार है। ताकि भाजपा से छिटक रहे ब्राह्मण समेत अन्य जातियों का उसे राजनीतिक लाभ मिल सके। उन्हें भी यह राजनीति कम समझ में आ रही है।
बदलाव बेशक हुआ पर नहीं बदले जातिगत समीकरण
कादीपुर के पास बड़ा कटघर गांव की तरफ बढि़ए। गांव से कुछ पहले चाय की दुकान पर कुछ लोग मिलते हैं। कोई भी चर्चा छेड़ने पर जनता ही पक्ष और विपक्ष की बहस का मंच संभाल लेती है। सभी को पता है कि ढाई घंटे में सड़क के रास्ते लखनऊ और 7-8 घंटे में दिल्ली पहुंचा जा सकता है। राम मंदिर बन रहा है, बाबा विश्वनाथ धाम में प्रधानमंत्री दर्शन पूजन कर आए हैं।
वाराणसी-लखनऊ राजमार्ग, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे ने कनेक्टिविटी बढ़ा दी है। हर गांव में आजादी के बाद से पर्याप्त राशन, किसान सम्मान निधि, डायरेक्ट बेनेफिट बंट रहा है। बिजली आ रही है, लेकिन जनता के तमाम मुद्दे भी जस के तस हैं। लगभग सभी का मानना है कि चुनाव में जाति के समीकरण हावी रहेंगे। आधे से अधिक लोगों का कहना है कि ठाकुर वोट भाजपा के साथ रहेगा। ब्राह्मण 40 फीसदी ही भाजपा के साथ रहेगा। बाकी बंटेंगे।
ब्राह्मण की तरह ही 18 प्रतिशत मुसलमान वोट भाजपा को हराने वाली पार्टी को वोट देगा। दलित वोटों में बंटवारा होगा और तमाम जातियां बसपा का साथ छोड़कर भाजपा, सपा को वोट देंगी। यादव का इक्का-दुक्का वोट ही कटेगा, अन्यथा सब समाजवादी पार्टी के साथ जाएंगे। सुधाकर सिंह स्थानीय स्तर पर चुनावी सर्वे में लगे हैं। साफ बताते हैं कि उ.प्र. विधानसभा चुनाव की तासीर 2014, 2019 (लोक सभा) और 2017 (विधान सभा) से अलग रहने वाली है।