पं. राम नरेश त्रिपाठी सभागार परिसर में काकोरी के अमर शहीदों की लगी प्रतिमा में से गायब सचींद्रन
सुल्तानपुर। काकोरी कांड की घटना नौ अगस्त 1925 इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इस घटना के एक नायक शचींद्रनाथ बख्शी भी थे। उन्होंने काकोरी कांड के दौरान ट्रेन लूटने में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
इस महान क्रांतिकारी ने जिले में तीन वर्ष तक रहकर अंतिम सांस ली थी। फिलहाल जिले में उनकी याद में कोई भी स्मृति संजोयी नहीं जा सकी हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख कांतिकारी शचींद्रनाथ बख्शी का जन्म बनारस में हुआ था। इन्होंने काकोरी कांड में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था। घटना के कुछ दिन बाद उन्हें भागलपुर से गिरफ्तार कर लिया गया था। 13 जुलाई 1927 को इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। बाद में 1937 में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।
इनके बेटे राजेंद्र बख्शी सुल्तानपुर की नगर पालिका में जलनिगम में सहायक अभियंता थे। शचींद्र नाथ वर्ष 1981 से आकर यहीं रहने लगे। जिले के गिने-चुने लोग ही इनसे मिलते थे। परऊपुर के रहने वाले करतार केशव यादव से इनकी नजदीकियां थीं।
करतार केशव यादव ने बताया कि शचींद्र ने काकोरी कांड के बारे में बताया था कि ट्रेन में लूट के दौरान गार्ड जगन्नाथ ने इनको पहचान लिया था। उस समय उन्होंने गार्ड से कहा कि हाथ में पिस्तौल है और गोली भी, एक गोली में तुम मर जाओगे। तब गार्ड ने कहा कि मुझे छोड़ दो, मैं मुकदमे के दौरान आपको पहचानूंगा नहीं।
अंत में गार्ड अपनी बात पर अडिग रहा। तीन बार की पेशी में गार्ड ने शचींद्र को पहचानने से मना कर दिया, जिसके बाद वे बरी हो गए। करतार बताते हैं कि 23 नवंबर 1984 को इनकी मौत तत्कालीन जिला अस्पताल में इलाज के दौरान हुई थी।