सुल्तानपुर। कोरोना की दूसरी लहर ने बहुत से परिवारों को अपनों से जुदा कर दिया है। किसी को अपनी पत्नी खोने का गम है तो कोई पति के चले जाने से वियोग में है।
इस सब पर छोटे-छोटे बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारियों का बोझ भी कम नहीं है। बच्चे भी अपने मां अथवा पिता की मृत्यु से गमजदा हैं।
कोरोना ने किसी बच्चे का पिता छीना है तो किसी की मां। कोरोना के शिकार हुए पिता अथवा माता के बाद जिम्मेदारियों का बोझ एकल अभिभावकों के ऊपर है।
मासूम बेटियों के भविष्य की चिंता
कुड़वार क्षेत्र के बहुबरा गांव निवासी हरि नारायण गुप्ता सुरेश नगर में साइबर कैफे चलाते थे। सात मई को कोरोना संक्रमण की वजह से उनका निधन हो गया। हरि नारायण के पांच साल की बेटी वैष्णवी और चार साल की बेटी आराध्या है।
पत्नी रेखा गुप्ता अपनी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। वे कहती हैं कि बड़ी बेटी स्कूल भी जाने लगी थी। लॉकडाउन की वजह से विद्यालय बंद हो गए थे। पति की मौत के बाद अब इन बच्चियों का भविष्य कैसे संवरेगा, यह चिंता का विषय है।
बच्चों की परवरिश की कठिन जिम्मेदारी
धनपतगंज क्षेत्र के भगवानपुर गांव निवासी भारती पांडेय की 21 अप्रैल को अमहट के एल-2 अस्पताल में कोरोना की वजह से मौत हो गई थी। भारती के दो बेटे दीपेश पांडेय और दीपांश पांडेय क्रमश: कक्षा 11 और कक्षा सात में अध्ययनरत हैं।
भारती की मौत के बाद बच्चों की परवरिश का जिम्मा उनके पति दीप नारायण पांडेय के ऊपर आ गया है। अब उन्हें पिता के साथ ही मां की कमी को भी पूरा करने की कोशिश करनी होगी।