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Sultanpur News: किताबों व गीत के माध्यम से सहेज रहे हिंदी की बिंदी

Mon, 14 Sep 2026 12:10 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
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सुल्तानपुर। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के बीच आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो हिंदी को सिर्फ भाषा नहीं, माथे की बिंदी मानकर सहेज रहे हैं। किताबों, कविताओं और लोकगीतों के जरिये वे नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने का काम कर रहे हैं। हिंदी दिवस के मौके पर ऐसे ही कई रचनाकारों से बात हुई तो उनका दर्द भी सामने आया और जुनून भी। उनका कहना है कि हिंदी बाजार की भाषा तो बन गई, लेकिन संस्कार की भाषा बनकर कहीं खो रही है।
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साहित्यकार सर्वेशकांत वर्मा बताते हैं हमने अपनी रचनाओं में अवधी, भोजपुरी के शब्दों को हिंदी में पिरोया है। बच्चे अपनी मिट्टी की बोली के साथ शुद्ध हिंदी भी सीख सकते हैं। एक किताब छापने में जेब से पैसा लगता है, पर जब कोई बच्चा उसे पढ़कर ''वाह'' कहता है तो लगता है हिंदी जिंदा है। सर्वेशकांत की हिंदी की 22 पाठ्य पुस्तकें आईसीएसई, सीबीएसई व यूपी बोर्ड में पढ़ाई जा रही हैं। वहीं, लोक गायक श्यामलाल प्रजापति की टोली हिंदी लोकगीतों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का काम करती है। मोबाइल और रील के दौर में वे हारमोनियम और ढोलक की थाप के साथ हिंदी की मिठास परोसते हैं। इनके गीतों में न तो अश्लीलता है, न ही नकल, बस अपनी भाषा का गौरव रहता है।
कवि राजबहादुर राना अवधी गीत के माध्यम से हिंदी को सहेज रहे हैं। वे गीत लिखते हैं और लोक गायक इन गीतों को गाते हैं। उन्होंने बताया कि जब तक किताबों के पन्ने पलटते रहेंगे और गीतों में हिंदी गूंजती रहेगी, तब तक माथे की ये बिंदी धुंधली नहीं होगी। रोजाना प्रार्थना के बाद 10 मिनट ''हिंदी की बिंदी'' नाम से एक शब्द का अर्थ और एक कविता बच्चों को सुनाते हैं। बच्चे भी अब हिंदी में बात करने में गर्व महसूस करने लगे हैं। बीएसए उपेेंद्र गुप्ता ने बताया कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए परिषदीय विद्यालयों में समाचार पत्रों को पढ़ने के लिए आदेश दिया गया है। बच्चे समाचार पत्र पढ़कर हिंदी सीख रहे हैं।
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