मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग की ओपीडी में लगी कतार।
सुल्तानपुर। संचार क्रांति ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव बच्चों की सेहत पर साफ दिखने लगे हैं। मोबाइल अब बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक हर काम में इसका इस्तेमाल हो रहा है। नतीजा यह है कि बच्चों की आंखें सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं।
मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग की ओपीडी में रोजाना 250 से 300 मरीज पहुंचते हैं। जिसमें 25 से 30 बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी आंखों की समस्या मोबाइल फोन के ज्यादा प्रयोग करने से जुड़ी होती हैं। बच्चों में डिजिटल आई स्ट्रेन, सूखी आंखें और मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) की दिक्कत तेजी से बढ़ रही हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि इससे न सिर्फ आंखें बल्कि बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत भी प्रभावित हो रहा है। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवप्रिया गुप्ता बताती हैं कि स्क्रीन देखने से पलकों की झपकने की संख्या घट जाती है। सामान्यत: एक मिनट में 12 से 14 बार पलक झपकनी चाहिए, लेकिन लगातार मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाने से यह कम हो जाती है। जिससे आंखों की नमी खत्म होती है और जलन, खुजली व लालिमा जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी भी आंखों को नुकसान पहुंचाती है। बच्चों में कम उम्र से ही निकट दृष्टि दोष का खतरा बढ़ रहा है।
बरतें सावधानी, कराएं जांच
-छह महीने में एक बार आंखों की जांच जरूर कराएं
-बच्चों को मोबाइल पर ब्लू प्रिंट चश्मा लगाकर ही देखने दें
-पढ़ाई के दौरान बीच-बीच में स्क्रीन से ब्रेक दिलवाएं
-मोबाइल पर खेलने की आदत पर सख्ती से नियंत्रण रखें