शहीद के पार्थिव शरीर के पास खड़े परिजन व अन्य लोग। संवाद
बंधुआकला। मंझना गांव में शुक्रवार सुबह सूरज उगते ही लोग अपने बलिदानी बेटे की एक झलक पाने के लिए बेसब्री से इंतजार करते दिखे। गांव में एक अजीब सा सन्नाटा था। हर ओर सिर्फ एक इंतजार था, अपने वीर बेटे अखिलेश शुक्ला की आखिरी झलक पाने का।
सेना का वाहन जैसे ही अलीगंज सीमा में दाखिल हुआ, सैंकड़ों की भीड़ उमड़ पड़ी। किसी के हाथ में तिरंगा था तो किसी की आंखों में आंसू। अखिलेश शुक्ला अमर रहे ...नारों से इलाका गूंज उठा। लोग छतों पर, दीवारों पर, पेड़ों तक पर चढ़कर अपने लाल की एक झलक पाने को बेताब दिखे। पार्थिव शरीर पहुंचा तो परिजनों का करुण विलाप माहौल को और भी गमगीन कर गया।
मां बेसुध हो गईं तो पिता की आंखों से आंसुओं की धारा थमने का नाम नहीं ले रही थी। 28 वर्षीय अखिलेश शुक्ला सेवानिवृत्त सूबेदार राधेकृष्ण शुक्ला के इकलौते पुत्र थे। तीन साल पहले सेना की 33 वर्कशॉप ईएमई कोर में नायक बने थे। कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनाती के दौरान 28 मार्च को सर्च ऑपरेशन में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुए। दिल्ली में इलाज के दौरान आठ अप्रैल को उन्होंने अंतिम सांस ली। अयोध्या से पहुंचे डोगरा रेजिमेंट के अधिकारियों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर उन्हें अंतिम सलामी दी। पिता राधेकृष्ण शुक्ला ने कांपते हाथों से अपने बलिदानी बेटे को मुखाग्नि दी।