सुल्तानपुर। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस व लॉकडाउन के चलते दुग्ध व्यवसायी कंगाली की राह पर पहुंच गए हैं। जिले में प्रतिदिन एक लाख लीटर से अधिक दूध का उत्पादन होता है। चाय की दुकान, होटल व ढाबा बंद होने से दूध की खपत नहीं हो पा रही है। मजबूरन पशुपालकों को गाय-भैंस का दूध औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है।
कोविड-19 से जंग लड़ने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन को एक माह से अधिक का समय बीत चुका है। लॉकडाउन के चलते शहर, बाजार व कस्बे बंद हो गए हैं। ऐसे में चाय की दुकानों पर पहुंचने वाले दूध की मांग व खपत न होने से उसका दाम भी गिर गया है।
ग्रामीण अंचल में दूध का व्यवसाय करने वाले छोटे पशुपालक अब दूध से दही, मट्ठा व घी तैयार कर इस्तेमाल कर रहे हैं। बड़े दूधियों का व्यवसाय चाय व मिठाई की दुकानें बंद होने से ठप हो गया है। कुछ दूधिए पास बनवाकर किसानों से औने-पौने दाम पर दूध लेकर शहर में घर-घर बिक्री कर रहे हैं।
शहर से सटे अमहट में दुग्ध उत्पादक संघ की पराग डेयरी चलती है। यहां के प्रभारी सुनील कुमार सिंह के अनुसार जिले में रोज एक लाख लीटर से अधिक दूध का उत्पादन होता है। पराग डेयरी से संबंधित 70 समितियां चल रही हैं। इसमें तीन हजार लीटर पराग डेयरी स्वयं लेती है। इस समय 34 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध की खरीद की जा रही है। इसके अलावा बचे हुए दूध को मदर डेयरी व ज्ञान डेयरी को दे दिया जाता है।
स्थानीय विकास खंड, कुड़वार और चांदा का गोमती का तराई इलाका दूध का बड़ा उत्पादक है। बड़ी मात्रा में दूध की खपत का आधार डेयरी समितियों के अलावा होटल, ढाबे व पनीर के साथ मावा बनाकर विक्रय करने वाले प्रतिष्ठान रहे हैं।
लॉकडाउन के बाद दुग्ध व्यवसाय को सबसे बड़ा झटका डेयरी समितियों के बंद होने से लगा है। ये समितियां सकल दुग्ध उत्पाद का करीब 30 प्रतिशत पशुपालकों से क्रय करती थीं। लॉकडाउन में होटल और मंडियों तथा ढाबों पर भी दूध का कारोबार बंद हो चुका है। पनीर और मावा निर्माण कंपनियों की भट्ठिया भी ठंडी पड़ी हैं। कई डेयरियों ने खरीद रेट आधे से भी कम कर दिया है। साथ ही खरीद की मात्रा भी आधी कर दी है। ऐसे में दुग्ध व्यवसाय करने वाले हजारों पशुपालकों को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।
क्षेत्र के सड़ांव निवासी कुशलावती सिंह बड़े पैमाने पर गोशाला का संचालन करती हैं। उनकी गोशाला से प्रतिदिन 100 लीटर दूध निकलता है। कुशलावती दुग्ध उत्पादन के संबंध में प्रदेश स्तर पर दो बार गोकुल पुरस्कार से सम्मानित भी हुई हैं। वे बताती हैं कि लॉकडाउन में सबसे बड़ा झटका पराग डेयरी से मिला है। दूध औने-पौने दाम पर बेचा जा रहा है। बाकी दूध बर्बाद हो रहा है।
क्षेत्र के नौगंवा निवासी जगभवन सिंह कहते है कि सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन कराते हुए डेयरी थोड़ा दूध खरीद रही है। समिति पर रेट घट जाने के कारण जिस गुणवत्ता के दूध की कीमत पहले 38 रुपये प्रति लीटर मिलती थी, अब 16-17 रुपये भी बड़ी मुश्किल से मिल रहा है। समितियां दूध भी पूरा नहीं खरीद रही हैं। इससे दुधारू जानवरों का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है।
बाहुबली डेयरी समिति के संचालक रणधीर सिंह बताते हैं कि डेयरी के दूध की डिमांड आधी हो गई है। रेट भी कम हो गया है। किसान दूध लेकर आते हैं, तो मजबूरन उन्हें लौटाना पड़ रहा है।