महात्मा बुद्ध की उपदेश स्थली गढ़ा, धार्मिक महत्व का विजेथुआ व धोपाप घाट, आजादी की लड़ाई की गवाह बादशाही मस्जिद व हसनपुर रियासत का भवन। ये जिले की कुछ ऐसी प्राचीन इमारतें हैं जो आजादी की लड़ाई से लेकर धार्मिक महत्व की बातें अपने में समेटे हैं। इन इमारतों के पीछे तमाम इतिहास छिपे हैं।
सभी का ग्रंथों व गजेटियर से लेकर अन्य पुस्तकों में कहीं न कहीं उल्लेख भी मिलता है। धार्मिक महत्व की कुछ इमारतों को आस्था के नाम पर लोगों ने सहेज कर रखा है लेकिन अन्य का इतिहास ही दांव पर लगा है।
निशान मिटने से ये स्थल सिर्फ इतिहास के पन्नों तक ही सिमट कर रह जाएंगे। यदि धार्मिक महत्व के कुछ स्थलों का विकास के साथ प्रचार-प्रसार हुआ होता तो ये बड़े पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकते थे।
बुद्ध की उपदेश स्थली गढ़ा को पहचान का संकट
महात्मा बुद्ध की उपदेश स्थली गढ़ा की पहचान संकट में है। ग्रेंट कुड़वार के पश्चिम गोमती नदी के किनारे गढ़ा स्थित है। इतिहासकारों के मुताबिक कलाम वंशीय क्षत्रियों ने कुड़वा नामक स्टेट इसी स्थान पर बनवाई थी। आगे चलकर इस स्थल को कुड़वार के नाम से जाना जाने लगा। बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक महात्मा बुद्ध ने कुछ दिनों तक यहां रुककर बौद्ध भिक्षुओं को दीक्षा दी थी।
इतिहासकारों के अनुसार चीनी यात्री ह्वेनसांग 636 ई. में कन्नौज से प्रयाग आया था। प्रयाग से गंगा पार कर वह उत्तर दिशा में आगे बढ़ा तब उसने काशेपुला नाम का शहर देखा। शहर में भव्य स्तूप था जो अत्यंत समृद्ध था। विद्वानों का मानना है कि ह्वेनसांग ने इसी स्थल का जिक्र किया था। सुल्तानपुर गजेटियर में भी गढ़ा का उल्लेख मिलता है। बताते हैं कि वर्षों पहले मुक्तानंद ने यहां एक बौद्ध सम्मेलन कराया था।
इतने सारे ऐतिहासिक व पुरातात्विक प्रमाणों के बावजूद यह स्थल उपेक्षा का शिकार है। सरकार के ध्यान नहीं देने से गढ़ा का खंडहर जंगलों में तब्दील हो चुका है।
प्राचीन धरोहर है तेलियाबुर्ज
मुसाफिरखाना के गुन्नौर में तेलियाबुर्ज मंदिर प्राचीन धरोहर के रूप में स्थित है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार मंदिर का निर्माण गांव के ही धनुवा तेली ने करवाया था। मंदिर का निर्माण कब हुआ? इसका कोई प्रमाण नहीं हैं। कभी इस स्थान को रिजगिढ़ के नाम से जाना जाता था।
मंदिर में शिव तथा विष्णु की मूर्तियां थीं। प्रकरण सामने आने के बाद पुरातत्व विभाग ने इस पर ध्यान दिया। इसकी बाउंड्री वाल का निर्माण करा दिया गया है। मंदिर की सुरक्षा के लिए चौकीदार लगाए गए हैं। इतिहास के प्रवक्ता विनोद कुमार पांडेय के मुताबिक यह मंदिर गुप्तकालीन है।