सुल्तानपुर। 'कहां तो तय था चरागा हरेक घर के लिए, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां आजादी के दीवानों के परिवारीजनों की दशा का आईना हैं। आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का छक्का छुड़ाने वाले स्वतंत्रता सेनानी के परिवारीजन देसी हुकूमत में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। अपने साहस एवं वीरता के बल पर ब्रितानी अफसरों के आंखों की किरकिरी बने आजादी के दीवानों को शायद इस बात का एहसास भी नहीं रहा होगा कि अपनी हुकूमत में उनके परिवारीजनों को ये दिन देखने पड़ेंगे। शासन-प्रशासन की अनदेखी से धनपतगंज क्षेत्र के एक सेनानी का परिवार अपना घर-बार छोड़कर चला गया तो दूसरा जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लगा है। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट-
नहीं सहा गया दर्द, गांव छोड़ भागा सेनानी का एक बेटा
धनपतगंज। मात्र 17 वर्ष की आयु में आजादी के दीवाने बन चुके क्षेत्र के कुट्टा गांव निवासी पं. अवध बिहारी मिश्र ने कानपुर से अपने आंदोलन की शुरुआत की थी। गणेश शंकर विद्यार्थी को प्रेरणास्रोत मानकर कानपुर में अपने पिता से संग रहकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार व अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन से अपना सफर शुरू किया। इसमें वे दो बार जेल गए और 10 बेंत की यातना सही।
आजादी के विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लेने की वजह से वे अंग्रेज अफसरों के आंखों की किरकिरी बन चुके थे। इसकी वजह उन्हें सीतापुर, बदायूं, बरेली, उन्नाव, कानपुर सहित प्रदेश की विभिन्न जेलों में डाला गया। जेलों में रहकर भी उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया। कानपुर व सीतापुर जेल में नजर बंद किए गए। देशो की आजादी के बाद तो मुल्क खुश हुआ लेकिन अपनी जवानी आजादी की लड़ाई में गंवाने वाले सेनानी के परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मुफलिसी में सेनानी के चार बेटे अच्छी पढ़ाई नहीं कर सके और बेरोजगार हो गए। पर्याप्त खेतबाड़ी नहीं होने से तीन बेटे नौकरी की तलाश में कानपुर चले गए। एक बेटा प्रेमानंद गांव में ही परिवार समेत रहकर विद्यालयों की साफ-सफाई कर गुजर बसर करने लगा। मुफलिसी के इसी दर्द में स्वतंत्रता सेनानी पं. राम अवध मिश्र का आठ नवंबर 1995 को स्वर्गवास हो गया। सेनानी की मौत के बाद मिल रही पेंशन भी बंद हो गई। अंत में गरीबी से जूझ रहा सेनानी का चौथा बेटा प्रेमानंद भी एक वर्ष पहले अपनी दो बीघा जमीन बेच कर परिवार समेत चला गया।
चंद्र प्रताप के परिवार को भी मदद नहीं
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ छात्र जीवन से संघर्ष करने वाले धनपतगंज के पीरोसरैया गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रप्रताप सिंह के परिवारीजन भी मुफलिसी के दौर से गुजर रहे हैं। 14 वर्ष की उम्र में पहली बार वर्ष 1931 में साढ़े तीन साल की जेल की सजा इलाहाबाद में काटी। जेल से छूटे तो फिर उन्हें 15 दिन के लिए दूसरे मामले में भेज दिया गया। इस दौरान उनकी हाईस्कूल की पढ़ाई छूट गई। पढ़ाई छूटने के बाद वे जिले में आकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने लगे।
इस दौरान एक आठ माह के लिए सुल्तानपुर जेल व भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने पर 1942 में उन्हें नैनी जेल मेें नजर बंद रखा गया। देश आजाद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी में भी सक्रिय भागीदारी निभाई लेकिन न तो कांग्रेस की ओर से उन्हें कोई सम्मान मिला और न ही सरकार की ओर से मुफलिसी के दौर में उनकी मृत्यु वर्ष 1996 में हो गई। तीन बेटों में एक बेटे की भी मौत हो गई जबकि दो बेटे गांव में आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। टूटे-फूटे आवास में रहकर मामूली खेती-बाड़ी से परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं। सेनानी के बेटे सवितेंद्र के मुताबिक आज तक सरकार की ओर से न तो कोई सम्मान और न ही कोई सहायता। सवितेंद्र का कहना है कि पिता की मौत के बाद घर आए तहसीलदार उनसे संबंधित कागजात भी लेकर चले गए।