आजादी के बाद देश में लोकतांत्रिक प्रणाली लागू हुई, राजतंत्र का खात्मा हुआ। संविधान ने एक झटके में देश के राजा-रजवाड़ों को आम आदमी के समान कर दिया। इसके बावजूद तमाम राजा-रजवाड़ों ने न केवल सियासत में जोरदार एंट्री की बल्कि खुद को जनता से जोड़े भी रखा। ऐसे ही राजघरानों में अमेठी भी शुमार रही।
देश की आजादी के बाद से ही अमेठी राजघराने के लोगों ने कई चुनाव लड़े। अधिकतर में उन्हें सफलता मिली। कुछ में शिकस्त का मुंह भी देखना पड़ा। मौजूदा चुनाव में भी अमेठी राजघराना सक्रिय है। अमेठी नरेश व कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य डॉ. संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह इस बार भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं जबकि मौजूदा पत्नी अमीता सिंह कांग्रेस से मैदान में हैं।
राजशाही का शौक कहें या फिर दावे के मुताबिक समाजसेवा का जज्बा, आजादी के करीब सात दशक बाद भी अमेठी राजघराना राजनीति में काफी सक्रिय है। अमेठी नरेश रणंजय सिंह ने यहां से तीन बार विधानसभा चुनाव लड़ा। तीनों बार वे जीते। वे 1962 में सांसद भी निर्वाचित हुए। अस्सी के उतरते दशक में उनके पुत्र डॉ. संजय सिंह ने संजय गांधी के साथ सियासत में एंट्री की और 1980 का विधानसभा चुनाव जीता। 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जीत के अंतर का रिकॉर्ड गढ़ डाला।
उन्हें कुल वैध मतों का 96.97 फीसदी मत हासिल हुआ। वे 1998 में अमेठी और 2009 में सुल्तानपुर से लोकसभा के लिए भी निर्वाचित हुए। हालांकि 1989 के विधानसभा और 1999 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से शिकस्त भी मिली। 2002 के विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी अमीता सिंह का सियासत में प्रवेश हुआ। उन्होंने अमेठी से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचीं। 2004 में भाजपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने यहीं से उपचुनाव लड़ा।