सुल्तानपुर। राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा नेता अमित शाह पर कथित टिप्पणी को लेकर दर्ज मानहानि के मुकदमे में आठ साल बाद शिकायतकर्ता विजय मिश्र को निराशा हाथ लगी। एमपी-एमएलए कोर्ट ने सोमवार को राहुल गांधी को दोषमुक्त कर दिया। अदालत में शिकायतकर्ता न तो यह साबित कर सके कि टिप्पणी से उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और न ही मुकदमा दायर करने के अपने अधिकार को पर्याप्त आधार दे सके। गवाहों के बयानों में विरोधाभास और स्वतंत्र साक्ष्यों की कमी ने भी शिकायत को कमजोर किया।
राहुल गांधी के अधिवक्ता के मुताबिक, अदालत ने माना कि बंगलूरू में कथित टिप्पणी जनसभा के बाद प्रेसवार्ता में पूछे गए सवाल के जवाब में की गई थी। टिप्पणी मुख्य रूप से अमित शाह और भाजपा के संदर्भ में थी। इसमें विजय मिश्र का नाम नहीं था। भाजपा से जुड़े पदाधिकारी होने भर से किसी व्यक्ति को पार्टी या उसके अध्यक्ष के कथित अपमान पर व्यक्तिगत मानहानि का मुकदमा दायर करने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत के सामने पार्टी की ओर से अधिकृत पत्र भी पेश नहीं किया गया। अदालत ने कानूनी प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए शिकायतकर्ता की पात्रता पर सवाल उठाए।
गवाही में विरोधाभास, दावे के समर्थन में साक्ष्य नहीं
अधिवक्ता के अनुसार, शिकायतकर्ता की ओर से पेश गवाह वीडियो दिखाए जाने और आपस में मिलने के स्थान को लेकर एकमत नहीं थे। वे यह भी साबित नहीं कर सके कि कथित टिप्पणी से विजय मिश्र का सामाजिक सम्मान कम हुआ। स्वतंत्र साक्ष्यों के अभाव में मानहानि के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला। अदालत ने शिकायत के घटनाक्रम पर भी सवाल उठाए और मुकदमे के पीछे राजनीतिक या अन्य मंशा होने की आशंका जताई।
फैसले को ऊपरी अदालत में देंगे चुनौती
फैसले से असंतुष्ट विजय मिश्र के अधिवक्ता ने कहा कि प्रमाणित प्रति मिलने के बाद आदेश का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद फैसले को अपीलीय अदालत में चुनौती देंगे। उनका दावा है कि राहुल गांधी को दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं, जिन्हें अपील के दौरान प्रस्तुत किया जाएगा।
कांग्रेस ने फैसले को बताया सत्य की जीत
कांग्रेस ने राहुल गांधी के दोषमुक्त होने को भाजपा के मुंह पर तमाचा बताया। प्रदेश प्रवक्ता राजेश तिवारी ने कहा कि सस्ती लोकप्रियता के लिए किसी राष्ट्रीय नेता को परेशान करना उचित नहीं है। जिलाध्यक्ष अभिषेक सिंह राणा ने कहा कि अदालत के फैसले से कार्यकर्ताओं का संविधान और कानून पर विश्वास मजबूत हुआ है।