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अपनी हदों से आज गुजरता चला गया...

Mon, 28 Dec 2015 11:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, सोनभद्र
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गालिब जयंती के मौके पर राबर्ट्सगंज के स्वामी विवेकानंद प्रेक्षागृह में मित्र मंच की ओर से आयोजित बज्म-ए- मुशायरा गंगा-जमुनी तहजीब के पुरखुलूस एहतराम का गवाह बन गया। इस मंच से देवी गीत और नात-ए-पाक पेश किया गया तो लोगों ने जमकर भारत माता के जयकारे लगाए।
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अमर शायर मिर्जा असद उल्ला बेग खां गालिब को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। शायर, शाइरा ने समसामयिक गजलें, शेर और मुक्तक से लोगों को बांधे रखा।


मुख्य अतिथि जिला पूर्ति अधिकारी एपी सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार अजय शेखर ने शमा रोशन कर बज्म-ए-मुशायरा की शुरूआत की। डीएसओ ने मिर्जा गालिब को याद करते हुए कहा कि गालिब मानवीय संवेदनाओं, इंसानियत की पैरोकारी व देश प्रेम भरपूर प्रवृति के महान शायर थे।


कानपुर से आए कलीम दानिश ने संचालन की जिम्मेदारी संभाली जबकि अध्यक्षता अजय शेखर ने की। संचालक ने गंगा-जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाते कवि जगदीश पंथी को इल्म की देवी की वाणी वंदना के लिए आवाज दी, जिन्होंने हे मइया मोरी असरन सरन देवइया गाकर मां सरस्वती वंदना की।
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फिर शायर जमील खैराबादी ने नात-ए-पाक नूर से जब दिल मुन्नवर हो गया, गुम्बदे खजरा का मंजर हो गया पढ़ा। अख्तर कानपुरी ने तेरे बगैर जीना है मुश्किल बहुत मगर, जिंदा हूं जी रहा हूं अभी तक मरा नहीं सुनाकर वाहवाही लूटी। शायर शिव नारायण शिव ने हर कदम हर डगर हर ठिकाने का है, यूं बुरा हाल सारे जमाने का है गजल पेश किया। हिना आरजू ने गजल मैं ये तुमसे नहीं कहती किसी से प्यार मत करना, अगर हो जाए तो इस बात का इजहार मत करना सुनाकर महफिल में नसीहत का नूर भर दिया।


कानपुर के शफीक अय्युबी ने मुशायरे में हास्य का तड़का लगाकर इसे और भी ऊंचाई प्रदान की। पत्नी नहीं पसंद थी लानी पड़ी मुझे, अब्बामियां की लाज बचानी पड़ी मुझे जैसे अनेक हास्य व्यंग्य की रचनाएं सुनाई। अब्दुल हई ने मैं अब खामोश रहता हूं किसी से कुछ नहीं कहता, अगर सच बोल दूं तो सारे रिश्ते टूट जाएंगे सुनाया। विकास वर्मा ने अपनी हदों से आज गुजरता चला गया, आइना सामने था संवरता चला गया सुनाया।


घोसिया से आए कासिम नदीमी ने जिंदाबाद आपकी दोस्ती का सफर पल में तय हो गया, इक सदी का सफर पल में तय हो गया सुनाया। संचालक कलीम दानिश ने पानी कुसुरवार न दरिया कुसुरवार, सच पूछिए तो डूबने वाला कुसुरवार सुनाया। शाइस्ता सना ने सुनाया कभी खुशबू समझती हूं कभी संदल समझती हूं, मैं आशीर्वाद को अपने लिए आंचल समझती हूं सराही गई।


शायर जमील खैराबादी ने बड़ी हिम्मत है मिट्टी के दिए में ये हर घर में उजाला कर रहा है, जो था मुमताज सारे मयकशों अरे तौबा वो तौबा कर रहा है, जैसी अनेक गजलें सुनाकर महफिल लूट ली। सदारद कर रहे अजय शेखर ने बंजारों को बस्ती और वीरानों से क्या मतलब है, नदी किनारे की कश्ती को तूफानों से क्या मतलब है सुनाकर महफिल को अंजाम तक पहुंचाया।
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