नदियों की वर्तमान स्थिति पर उन्होंने कहा कि नदियों से बालू के खनन और दोहन से नदी का फेफड़ा सूख जाता है और नदी बीमार हो जाती है। जिसका असर हमारे शरीर पर पड़ता है। इस चक्र को समझना जरूरी है। नदी की हत्या कर खनन करने वालों के खिलाफ स्थानीय जनता को आगे आने की जरूरत है।
उन्होंने सोन, कनहर और पांगन नदी में होने वाले खनन को लेकर चिंता जताया। महिलाओं का आह्वान किया कि वे नदियों को बचाने के लिए आगे जाएं। यह आप की नैतिक जिम्मेदारी है कि धरती पर हरियाली लाने का प्रयास करें और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वालों के खिलाफ अहिंसात्मक लड़ाई लड़े। सोनभद्र की मिट्टी हवा,पानी सब प्रदूषित हो गया है। यह पूंजीपतियों का ही देन है।
आज हमारा अधिकार छीना जा रहा है। हम विवश किए जा रहे है, लेकिन हमें चुप नहीं बैठना है हमारे पास ताकत है वह है लोक की ताकत, जिससे तंत्र को ठीक किया जा सकता है। कहा कि नदियों, पहाड़ों और जंगलों को बचाने के लिए युवाओं, छात्रों, आमजनों और तंत्र सबको आगे आना चाहिए। जो लोग इसके लिए संघर्ष कर रहे है उंन्हे निराश नही होना चाहिए। आजादी की लड़ाई 1857 से शुरू होकर 1947 तक 90 साल चली। हमे अहिंसात्मक तरीके से संघर्ष करते रहना है। कार्यक्रम मैं बड़ी संख्या में आश्रम कार्यकर्ता और महिलाएं मौजूद रहीं।