गुप्तकाशी एवं दक्षिणकाशी नामों से विख्यात शिवद्वार धाम में श्रावण मेला और कांवड़ियों की तरफ से जलाभिषेक की तैयारियां पूरी हो चुकी है। उमामाहेश्वर की दुर्लभ प्रतिमा के लिए विख्यात शिवद्वार लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। आदिदेव महादेव एवं माता पार्वती के दुर्लभ विग्रह का दर्शन- पूजन करने के लिए दूर-दूर से यहां पर श्रद्धालु आते हैं।
जिला मुख्यालय सोनभद्र के दक्षिण-पश्चिम में 39 किलोमीटर दूर और घोरावल तहसील मुख्यालय के दक्षिण में 10 किलोमीटर दूर स्थित शिवद्वार धाम आज आस्था का केंद्र है। बेलन नदी के करीब शिवद्वार मंदिर में स्थापित आशुतोष भगवान शिवशंकर और आदिशक्ति माता भगवती की काले पत्थर से बनी साढ़े चार फीट ऊंची इस अद्वितीय मूर्ति के दर्शन करने पर निगाहें नहीं हटती हैं।
उमामहेश्वर की यह प्रतिमा 1305 फसली सन में मोती महतो नामक व्यक्ति को मिली थी। किंवदंतियों के अनुसार खेत में हल जोतते समय यह दिव्य प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसे मोती महतो ने वहां पर एक मंदिर बनवाकर स्थापित कराया था। शिवद्वार के बाबू जगतबहादुर सिंह की पत्नी बहुरिया अविनाश कुंवरि ने शिवद्वार मंदिर का निर्माण वर्ष 1942 में अपने स्वर्गीय पति की पुण्यस्मृति में कराया था। 1985 में मंदिर में शिवलिंग की वैदिक रीति से स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गई थी।
प्राचीन हैं शिवद्वार की मूर्तियां
लास्य शैली की इस प्रतिमा का कालखंड कुछ विद्वान ग्यारहवीं शताब्दी मानते हैं। जबकि कुछ आठवीं और कुछ विद्वान और अधिक प्राचीन मानते हैं। शिवद्वार के आस-पास के इलाकों में भारी संख्या में प्राचीनकाल की मूर्तियां मिली हैं। कई मूर्तियों को 2009 में स्थापित संग्रहालय में रखा गया तो तमाम मूर्तियां इलाके में यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं। पास के बर कन्हरा में मां काली और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है।
वर्ष 1986 में शुरू हुई कांवड़ यात्रा
घोरावल। शिवद्वार में कांवड़ यात्रा की शुरूआत वर्ष 1986 में हुई। सर्वप्रथम तेरह श्रद्धालुओं ने मिर्जापुर के बरिया घाट गंगा नदी से रविवार को कांवर में गंगाजल भरकर 67 किलोमीटर की कठिन यात्रा पूर्ण कर श्रावण मास के अंतिम सोमवार को शिवद्वार स्थित शिवमन्दिर में भगवान शिवशंकर का जलाभिषेक किया था।