अवैध खनन की सीबीआई जांच जारी रखने के हाईकोर्ट के आदेश से खान विभाग, वीआईपी सिंडिकेट और प्रशासनिक अमला सकते में आ गया है। मानक से अधिक बालू और पत्थर के खनन का परमिट जारी करने वालों के हाथ-पांव फूल गए हैं। इस बीच हाईकोर्ट के फैसले के बाद वीआईपी वसूली रोकने के लिए शुक्रवार को बैठक भी हुई, जिसमें विभागीय अधिकारियों से लेकर वीआईपी सिंडिकेट के सदस्य शामिल हुए। सीबीआई जांच में सोनभद्र और मिर्जापुर का नाम शामिल होने के कारण माना जा रहा है कि दोनों जिलों में सीबीआई कभी भी दस्तक दे सकती है।
सोनभद्र में अवैध खनन कारोबार लंबे समय से चल रहा है मगर बसपा के शासनकाल में शुरू हुए ‘वीआईपी’ के इस खेल से अवैध खननकर्ताओं को मनमानी की छूट मिल गई। बसपा सरकार में पौंटी चड्ढा ग्रुप वीआईपी वसूलता था। सपा की सरकार बनी तो एक महिला आईएएस और सपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी के खासमखास की सिफारिश पर 2013 में वीआईपी वसूली का ठेका हरियाणा के छिंकारा ग्रुप को मिला। अक्तूबर तक छिंकारा ग्रुप जिले में वीआईपी वसूलता रहा। नवंबर माह में यह काम मुख्तार अंसारी और वाराणसी के माफिया को दे दिया गया। यही से इसका नाम वीआईपी सिंडिकेट पड़ गया।
अमर उजाला ने सोनभद्र में माफियाओं ने दी दस्तक शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया तो तत्कालीन डीएम चंद्रकांत और एसपी रामबहादुर यादव की गोपनीय रिपोर्ट पर शासन ने मुख्तार अंसारी एंड कंपनी का बोरिया-बिस्तर बंधवा दिया। फिर वीआईपी वसूली का काम जनवरी 2014 से खान विभाग देखता रहा। एक जुलाई, 2015 से वीआईपी वसूली के लिए नया सिंडिकेट बनाया गया। इनमें खनन व्यवसायी के पुत्र, सपा के नेता और एक अन्य व्यक्ति को रखा गया। मुन्ना बजरंगी से जुड़ा एक खनन व्यवसायी भी कुछ दिनों तक सिंडिकेट का काम देखता रहा।