सोनभद्र। जिले में सिर्फ कोयला, लाइमस्टोन, इस्पात, यूरेनियम ही नहीं कई बहुमूल्य रत्नों का भंडार है। जिले की खनिज संपदाओं का विस्तृत अध्ययन कर चुकी लखनऊ विवि की टीम का दावा है कि यहां की धरा में कई बहुमूल्य रत्नों का खजाना छिपा हुआ है। खासकर सोन नदी किनारे जुगैल क्षेत्र में स्फटिक क्रिस्टल, हकीक, अगेट और लाल जैस्मर की बड़ी मौजूदगी के दावे किए गए हैं।
इसकी गुणवत्ता को पूरी तरह से स्पष्ट करने के लिए संग्रहित नमूनों का गुजरात स्थित लैब से परीक्षण कराए जाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। दावा है कि भूवैज्ञानिकों के अध्ययन में रत्नों सहित अन्य खनिज संपदाओं को लेकर जो संकेत सामने आए हैं उसको लेकर विस्तृत सर्वेक्षण की प्रक्रिया अपनाई जाए तो सोन नदी से सटा कोन-जुगैल क्षेत्र का अंचल रोजगार का बड़ा केंद्र बना नजर आएगा।
सितंबर 2023 में लखनऊ विवि के प्रोफेसर (भूगर्भशास्त्री) विभूति राय की अगुवाई में एक टीम ने सोन नदी किनारे जुगैल और कोन क्षेत्र का दौरा किया था। इस दौरान यहां मौजूद खनिजों के साथ ही नए खनिज भंडारों की स्थिति जांची गई थी। टीम को जुगैल क्षेत्र के साथ ही बिजौरा से नेवारी के बीच सेमिया इलाके में क्रिस्टल के रूप में उत्तम गुणवत्ता वाले स्फटिक की मौजूदगी तो मिली ही थी लाल जैस्पर से जुड़ी एक पहाड़ी के भी खोज का दावा किया गया था। नेवारी में पोटाश की पहाड़ी मिलने की बात कही गई थी।
इस क्षेत्र में कंग्लोमरेंट डाइमेंशनल स्टोन की भी बड़ी मौजूदगी मिलने का दावा किया गया था। वहीं कोन क्षेत्र के झिरगाड़डी के पास सिरेमिक क्ले का बड़ा भंडार सामने आया था। इसके अलावा हकीक, अगेट जैसे रत्न की भी मौजूदगी का संकेत मिलने की बात कही गई थी। टीम ने जिन-जिन स्थलों का दौरा किया था। वहां से जांच के लिए कई नमूने उठाए गए थे। लखनऊ विश्वविद्यालय स्तर पर इसके शोध की प्रक्रिया अपनाए जाने के बाद अब इन नमूनों की स्थिति को और स्पष्ट करने के लिए गुजरात के एक लैब से परीक्षण को लेकर प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
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जानिए, किस रत्न-खनिज का क्या है उपयोग :
- स्फटिक क्रिस्टल एक पारदर्शी रत्न है। माला और ब्रेसलेट आभूषण के रूप में इसे पहना जाता है। शरीर पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों से बचाव के लिए अंगूठी-माला आदि के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
- कंग्लोमरेट डाइमेंशनल स्टोन का ज्यादातर उपयोग घर के फर्श, दीवारों और छत की टाइलों के निर्माण में किया जाता है।
- सिरेमिक मिट्टी का उपयोग बर्तन, टाइल, सैनिटरी उपकरण, मूतिंया बनाने आदि में किया जाता है। सिरेमिक पाउडर के रूप में भी इसका उपयोग होता है। कलात्मक मूर्तियों के लिए यह पहली पसंद है।
- लाल जैस्पर को शक्तिशाली रत्न का दर्जा हासिल है। इसका उपयोग मुख्यत: सजावटी वस्तुओं और आभूषण निर्माण में तो किया ही जाता है। मूर्तियों-कलाकृतियों के निर्माण के लिए भी इसकी खासी मांग है। आध्यात्मिक दृष्टि से सुरक्षा ताबीज के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
- झारखंड के गढ़वा की मुसकैनिया पहाड़ी के बाद भूवैज्ञानिकों के दल ने सोनभद्र के भरहरी में पोटाश की पहाड़ी होने का दावा किया गया है। उर्वरक उद्योग के लिए यह खोज महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
वर्जन -
जुगैल क्षेत्र में सोन नदी के किनारे की पहाड़ियों में अच्छी गुणवत्ता वाले स्फटिक क्रिस्टल, लाल जैस्फर सहित अन्य रत्नोें की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। पोटाश की पहाड़ी पाई गई है। झिरगाडंडी एरिया में सिरेमिक क्ले की अच्छी मात्रा है। सरकार को सलाह दी गई है कि संबंधित इलाके में फैक्ट्री लगाई जाए ताकि लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सके। - प्रो. विभूति राय, भूगर्भशास्त्री, लखनऊ विश्वविद्यालय।
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इस तरह की खोजों का मसला सीधे जीएसआई या केंद्र-राज्य के खनिज अन्वेषण अनुभाग से जुड़ा होता है। पाए गए खनिजों और आगे की कार्रवाई का भी निर्णय उच्चस्तर पर लिया जाता है। - शैलेंद्र कुमार सिंह, ज्येष्ठ खान अधिकारी सोनभद्र।