आज 35 साल पूरे हो गए। मिर्जापुर से अलग कर जब नए जिले के रूप में सृजन हुआ, तब मेरे पास विरासत में दाे चीजें थीं। पहला पिछड़ापन और दूसरा प्रकृति की अनमोल थाती। अलग जिला बनने के बाद विकास की बयार बही। नए दफ्तर खुले, अस्पताल और स्कूल बने। गांव-गांव सड़कें बिछ गईं। उद्योगाें की स्थापना के साथ तरक्की की राह खुली। जब लोग मुझे ऊर्जा की राजधानी कहते हैं तो सुनकर फख्र होता है। मेरे यहां बनी बिजली से देश के बड़े-बड़े शहर रोशन हो रहे हैं। औद्योगिक इकाइयों की खुराक बनकर हमारा कोयला उनके उत्पादन को बढ़ा रहा है। हमारे गिट्टी-बालू और सीमेंट से अट्टालिकाएं बन रही हैं, जिनमें बैठकर देश-प्रदेश के विकास की रुपरेखा तैयार होती है। सचमुच यह देखकर मन गदगद हो जाता है कि देश की तरक्की में मेरा भी इतना योगदान है, लेकिन दूसरी तरफ जब मेरे मूल वाशिंदों की बदहाली पर नजर जाती है तो अपार कष्ट भी होता है। रोजी-रोटी, अच्छी शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के लिए उन्हें आज भी जूझते देखकर मन द्रवित हो उठता है। पिछड़ापन दूर करने के लिए विकास के नाम पर प्रकृति के खजाने को खूब लूटा गया, लेकिन मूल आबादी की बुनियादी जरूरतें आज भी पूरी नहीं हो पाई हैं। उम्मीद है कि नीति नियंता मेरी इस पीड़ा को समझेंगे और आने वाले सालों में इसके उपचार का प्रयास करेंगे। आप सभी को हमारी शुभकामनाएं... आपका सोनभद्र।
ऐसे हुआ था सोनभद्र का गठन
सबसे पहले 1967 में डॉ. लोहिया ने उठाई आवाज, फिर खड़ा हुआ जनांदोलन
मिर्जापुर के दक्षिणांचल को अलग कर नए जिले की स्थापना की आवाज सबसे पहले डॉ. राममनोहर लोहिया ने उठाई है। वर्ष 1967 में जब वह यहां भ्रमण पर आए तो दुरुह भौगोलिक स्थिति और जिला मुख्यालय से अत्यधिक दूरी को देखकर उन्होंने नए जिले की जरूरत बताई थी।
इसके बाद 1968 में सोशलिस्ट पार्टी के स्थानीय नेताओं ने अलग जिला बनाने के लिए आंदोलन शुरू किया। वर्ष 1970 में अजय शेखर, सूर्यबली सिन्हा, सूर्यकांत त्रिपाठी और योगेश शुक्ला को राबर्ट्सगंज तहसील पर कब्जा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह एक साल तक जेल में रहे। इसके बाद जिला बनाने की मांग ने जन आंदोलन का रूप ले लिया।
बार एसोसिएशन, व्यापार संगठन सहित अन्य संस्थाओं ने मिलकर व्यापक रूप में अनशन, प्रदर्शन और बाजार बंद किया। तत्कालीन सांसद रामप्यारे पनिका, विधायक रामनाथ पाठक, तीरथराज आदि ने इसे समर्थन देते हुए मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया, नतीजा सरकार ने नए जिले की स्थापना को मंजूरी दी।
डीएम-एसपी को साथ लाए थे मुख्यमंत्री
जिला बनाओ आंदोलन के नेता रहे अजय शेखर बताते हैं कि 04 मार्च 1989 को सोनभद्र के रूप में नए जिले का एलान हुआ था। मंडी समिति के परिसर में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इसकी घोषणा की। वह अपने साथ नए जिले के लिए डीएम-एसपी को भी साथ लेकर आए थे।
सुरेश चंद्र दीक्षित को सोनभद्र का पहला जिलाधिकारी बनाया गया, जबकि रिजवान अहमद पुलिस अधीक्षक नियुक्त हुए थे। महफूज अली एडीएम थे। जिले के लिए तीन नाम सुझाए गए थे। इसमें सोनभद्र पर सहमति बनी। अपने भाषण में सीएम ने कहा था कि सोनभद्र को सही मायने में सोनभद्र बनाएंगे। इसके लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी। उन्होंने बताया कि जिले के निर्माण में बार के तत्कालीन अध्यक्ष महेंद्र पांडेय, चंद्रभूषण मिश्र, मार्तंड मिश्र, राजेंद्र अग्रवाल राजन सहित कई अन्य लोगों ने अहम योगदान दिया था।
इन्होंने बढ़ाया जिले का नाम
पद्मश्री डॉ. हनीफ शास्त्री: दुद्धी के जुगनू चौक के रहने वाले डॉ. हनीफ शास्त्री संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने गीता और कुरान का संस्कृत में अनुवाद किया था। साहित्य और शिक्षा के बीच असाधारण फर्क को समझाने के लिए उन्हें वर्ष 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। पद्मश्री पाने वाले वह जिले के एकमात्र व्यक्ति हैं। गीता और कुरान में सामंजस्य, मोहंगीता, वेदों में मानवाधिकार सहित कुल आठ किताब लिखी थी।
रामबाबू: मधुपुर के बहुअरा गांव के निवासी रामबाबू एथलीट हैं। पैदल चाल की स्पर्धा में उन्होंने पिछले साल एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीता था। गरीबी में पले-बढ़े रामबाबू मजदूर किसान के बेटे हैं। वर्ष 2022 में गुजरात में हुए राष्ट्रीय खेलों में रामबाबू ने नया राष्ट्रीय रिकार्ड कायम करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया था। यह उपलब्धि पाने वाले वह जिले के पहले खिलाड़ी हैं।
इनसे है पहचान
सोनभद्र को देश में ऊर्जा राजधानी के रूप में जाना जाता है। पिपरी में रिहंद बांध पर निर्मित पं. गोविंद बल्लभ पंत सागर की सबसे बड़े कृत्रिम जलाशय के रूप में पहचान है। इस जलाशय पर आधारित करीब 20 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाले संयंत्र स्थापित हैं। प्रतिदिन पूरे प्रदेश में औसतन इतनी ही बिजली की खपत होती है।
इसके अलावा यहां स्थित सलखन का फासिल्स पार्क दुनिया का सबसे बड़ा फासिल्स पार्क है। यह फासिल्स 180 करोड़ साल पुराने हैं। उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा खुला वन क्षेत्र भी सोनभद्र में ही है, जिसमें प्रचूर मात्रा में चिरौंजी, लाख, महुआ, कत्था जैसे वनोपज और जड़ी-बूटियां मिलती हैं। रेणुकूट में स्थापित हिंडाल्को की गिनती एशिया के बड़े एल्यूमिनियम कारखाने के रूप में होती है।
भविष्य में ऐसा होगा सोनभद्र
नीति आयोग की ओर से अति पिछड़े जिलों में चिह्नित सोनभद्र में बदलाव तेजी से हो रहे हैं। यहां इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई चालू है। मेडिकल कॉलेज में भी नए सत्र से दाखिले शुरू हो जाएंगे। इससे जिले में ही डॉक्टर-इंजीनियर तैयार होंगे। म्योरपुर में एयरपोर्ट का निर्माण अंतिम चरण में है। वाराणसी और आजमगढ़ के बाद यह पूर्वांचल का तीसरा एयरपोर्ट होगा। देश-दुनिया के सभी प्रमुख शहरों से सोनभद्र की एयर कनेक्टिविटी हो जाएगी। इसके अलावा नई ओबरा डी, अनपरा-ई के अलावा पंप स्टोरेज पर आधारित पावर परियोजनाओं की स्थापना से जिले में रोजगार और विकास की नई संभावनाएं बनेंगी।
35 साल बाद भी नहीं मिल सका नाम
जिले की पहचान भले ही सोनभद्र के रूप में हो, लेकिन इस नाम से रिकाॅर्ड में कोई जगह यहां नहीं है। लंबी जद्दोजहद के बाद कुछ साल पहले ही रेलवे स्टेशन का नाम राबर्ट्सगंज से बदलकर सोनभद्र किया गया है। नगर पालिका परिषद को भी कुछ स्थानों पर सोनभद्र नाम दिया गया है, मगर चलन में अभी भी राबर्ट्सगंज ही है। तहसील, थाना भी राबर्ट्सगंज के नाम से ही हैं। यहां तक कि विधानसभा और लोकसभा सीट का नाम भी राबर्ट्सगंज ही है।