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साढ़े छह हजार अति कुपोषित बच्चे, फिर भी एनआरसी के बेड खाली

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जिले में साढ़े छह हजार से अधिक अति कुपोषित बच्चे होने के बाद भी पोषण पुनर्वास केंद्र के ज्यादातर बेड खाली हैं। अति कुपोषित बच्चों को यहां शरण नहीं मिल पा रही है। विभाग इसे जागरुकता की कमी बता रहा है जबकि आम लोग इसे कर्मचारियों की उदासीनता का असर मान रहे हैं। नतीजा कुपोषण को हराने का अभियान सुस्त पड़ता जा रहा है।
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सही खानपान और पोषण न मिलने से बीमार पड़ने वाले बच्चों को सुपोषित करने का सरकार का विशेष जोर है। कोरोना की संभावित तीसरी लहर के मद्देनजर भी छोटे बच्चों में पोषण स्तर बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। अति कुपोषित बच्चों के लिए जिला अस्पताल परिसर में पोषण पुनर्वास केंद्र स्थापित हैं। इसमें पांच वर्ष से कम आयु तक के उन बच्चों को विशेषज्ञों की निगरानी में रखने की व्यवस्था है जो अति कुपोषित हैं। नियमों पर गौर करें तो केंद्र में लगे दस बेड पर नियमित बच्चे होने चाहिए। प्रत्येक बच्चे को 14 दिन रखकर निगरानी करने और खानपान की भरपूर खुराक देने का भी प्रावधान है। इससे इतर जिले में हाल बदतर है। केंद्र में तीन-चार बेड ही भर पा रहे हैं। जो बच्चे भर्ती भी होते हैं वह केंद्र की दशा देख जल्द से जल्द घर जाने की कोशिश करते हैं। पिछले दिनों सीडीओ डॉ. अमित पाल शर्मा ने भी निरीक्षण के दौरान कम बच्चे मिलने पर असंतोष जताते हुए जिम्मेदारों से जवाब तलब किया था। इसके बावजूद व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है। आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के रुचि न लेने से भी इसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र के अधिकांश बेड खाली रहते हैं।
दस में सात बेड खाली
जिला अस्पताल में बने पोषण केंद्र में भर्ती होने वाले बच्चों के इलाज के लिए एक चिकित्साधिकारी की तैनाती की गई है। उनकी देखरेख में कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है। सुविधाओं के बावजूद पुनर्वास केंद्र के बेड नहीं भर पा रहे हैं। यहां कुल दस बेड हैं। इसमें शुक्रवार को तीन बच्चे ही भर्ती थे।
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पोषण पुनर्वास केंद्र में फिलहाल पांच बच्चे हैं। सभी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को निर्देशित किया गया है कि वह अपने क्षेत्र के अति कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर पोषण पुनर्वास केंद्र में भरती कराएं। ऐसा न करने वाली कार्यकत्रियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। - अजीत सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी।
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