खिसकते जलस्तर और बढ़ती तपिश का असर मत्स्य उत्पादन पर भी पड़ने लगा है। अप्रैल के पहले पखवारे में ही जिले में इसका उत्पादन 30 से 40 फीसदी तक गिर गया है। एशिया के विशालतम जलाशयों में एक रिहंद डैम से मछली निकासी में भी 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। मई-जून में और भी गिरावट देखने को मिल सकती है।
जिले में रिहंद डैम, धंधरौल बांध, नगवा बांध, बलुई बंधी के अलावा तीन सौ हेक्टेअर एरिया में स्थित तालाबों में मछली का पालन होता है। औसतन एक हेक्टेअर वाले तालाब से रोजाना पांच सौ कुंतल मछलियों के निकासी का औसत है। इस हिसाब से 15000 कुंतल रोजाना मछलियों की निकासी है। आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल शुरुआत से इसमें तीस से चालीस फीसदी तक की गिरावट आ गया है। जिन तालाबों से पांच सौ कुंतल मछलियां निकलती थीं, उनका उत्पादन घटकर तीन-साढ़े तीन सौ कुंतल पर आ गया है। इसी तरह रिहंद डैम से रोजाना का औसत आठ से दस कुंतल का है जो घटकर चार से पांच कुंतल पर आ गया है।
बलुई बंधी, नगवां बांध सहित अन्य जलाशयों से भी मछली निकासी में गिरावट आई है। बता दें कि किसी भी तालाब में बेहतर उत्पादन के लिए न्यूनतम जलस्तर छह फीट का मानक है। यह औसत इस समय ढाई से तीन फीट पर आ गया है।