यथार्थ गीता के उर्दू अनुवादक एवं जाने-माने शायर रहे मुनीर बख्श आलम की द्वितीय पुण्यतिथि बृहस्पतिवार को उरमौरा गांव स्थित उनके आवास पर मनाई गई। यहां गोष्ठी से पूर्व उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई। साहित्यकार नरेंद्र नीरव को आलम पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें स्मृति चिह्न, अंगवस्त्रम व नकद राशि दी गई।
राष्ट्रीय संचेतना समिति सोनभद्र व असुविधा परिवार की ओर से आयोजित लघु साहित्यिक गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि आलम के व्यक्तित्व को शब्दों की सीमाओं में बांध पाना आसान नहीं है। साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार अजय शेखर ने कहा कि आलम के साथ जो मेरे संबंध थे उसे या तो वह जानते थे या मैं जानता हूं। संबंधों का विज्ञापन जीवन का लक्ष्य नहीं रहा। मौन की भाषा में ही हम दोनों की वार्ता होती थी। राष्ट्रीय संचेतना समिति सोनभद्र व असुविधा परिवार ने आलम स्मृति सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र नीरव को प्रदान किया। अजय शेखर के साथ डॉ. अर्जुन दास केसरी, रामनाथ शिवेंद्र, नसीम व खुर्शीद आलम ने अंगवस्त्रम, स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र व 11 हजार की धनराशि प्रदान किया। समिति ने निर्णय लिया कि स्व. आलम का जन्मदिन एक जुलाई को मनाया जाएगा। इस मौके पर साहित्यकार डॉ. अर्जुनदास केसरी, रामनाथ शिवेंद्र, रमेश देव पांडे, अमरनाथ अजेय, ईश्वर विरागी, सुरेश तिवारी, हरिशंकर तिवारी, अब्दुल हई, प्रदुम्न त्रिपाठी, अशोक तिवारी, नसीम, आदि मौजूद रहे। संचालन जगदीश पंथी व आभार मुनीर बख्श आलम के बड़े पुत्र खुर्शीद आलम ने किया।