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Sonebhadra News: 48 साल से नहीं बदला गया था पैनल ब्रेकर, आईसीटी में आग लगने की बना वजह

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ओबरा। ओबरा-बी परियोजना के स्विच यार्ड में इंटर कनेक्टिंग ट्रांसफाॅर्मर में आग लगने के कारणों की जांच शुरू हो गई है। प्रथम दृष्टया आग लगने की वजह 48 साल पुराने ट्रांसफॉर्मर के पैनल ब्रेकर के जाम होने को माना जा रहा है। यह ब्रेकर ट्रांसफॉर्मर को ज्यादा गर्म होने से रोकता है। परियोजना के स्थापना काल से ही यह ब्रेकर लगा हुआ था, जिसे अब तक बदला नहीं गया था।
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ओबरा-बी परियोजना की स्थापना 1977 में हुई थी। तभी स्विच यार्ड का निर्माण कर इंटर कनेक्टिंग ट्रांसफॉर्मर लगाए गए थे। इकाई से उत्पादित बिजली इस ट्रांसफॉर्मर के माध्यम से ही 220 में तब्दील कर ग्रिड को भेजी जाती है। उच्च क्षमता का करंट होने से ट्रांसफॉर्मर के गर्म होने की आशंका रहती है। इसके मद्देनजर ही पैनल ब्रेकर लगाए जाते हैं। ब्रेकर का काम विद्युत सर्किट को असामान्य करंट के कारण होने वाली खराबी से बचाना होता है। जब सर्किट में कोई खराबी आती है तो ब्रेकर सर्किट को तुरंत तोड़ देता है, जिससे उपकरण और सिस्टम को नुकसान से बचाया जा सकता है। तकनीकी फाल्ट से ब्रेकर के काम न करने के कारण ही ट्रांसफॉर्मर के गर्म होने और शार्ट सर्किट से भीषण आग लगने की वजह मानी जा रही है। फिलहाल इसमें मानवीय भूल और ब्रेकर की लंबे समय से मरम्मत न होने की वजहों को भी खंगाला जा रहा है।
शुक्रवार को परियोजना के निरीक्षण पर आए उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक डॉ. रुपेश कुमार ने भी माना कि स्विच यार्ड में आग लगने की घटना को रोकने के लिए लगा ब्रेकर इकाई के निर्माण काल से ही लगा हुआ है। इसे बदलने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी। उन्होंने परियोजनाओं में लगे फायर फाइटिंग सिस्टम में सुधार करने में तेजी से लगा हुआ है, ताकि भविष्य में आग लगने की ऐसी घटनाओं को समय से रोका जा सके।
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तीन सदस्यीय कमेटी एक सप्ताह में देगी रिपोर्ट
उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक डाॅ. रुपेश कुमार ने शुक्रवार को ओबरा पहुंचे। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया। सभी उत्पादन इकाइयों की क्रियाशीलता देखी। फायर फाइटिंग सिस्टम को भी जांचा। निरीक्षण के बाद डाॅ. रुपेश कुमार ने बताया बी-टीपीएस स्विच यार्ड के आईसीटी में लगी आग के कारणों का पता लगाने के लिए एक तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की गई है। यह टीम अगले सात दिनों में निगम मुख्यालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। प्रथम दृष्ट्या आग लगने के लिए तकनीकी कारण सामने आ रहे हैं। जांच टीम तकनीकी पहलुओं के साथ ही मानवीय भूल आदि को भी संज्ञान में लेकर अपनी रिपोर्ट देगी। कहा कि इस घटना में कोई भी संबंधित व्यक्ति ओर अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने करीब 20 करोड़ की क्षति का अंदेशा जताया है।

ओबरा डी का काम शुरू होने में हो सकती है देरी
ओबरा। परियोजना में आग लगने की घटना के बाद ओबरा पहुंचे उत्पादन निगम के प्रबंध निदेशक डाॅ. रुपेश कुमार ने ओबरा ''डी'' परियोजना के निर्माण कार्य शुरू होने में हो रही देरी पर जानकारी दी। बताया कि किसी भी तापीय परियोजना को संचालित करने के लिए कोयले और पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में ओबरा डी परियोजना के लिए हुए कोल ब्लाॅक के आवंटन की दूरी ज्यादा होने की वजह से बिजली उत्पादन की दर महंगी हो सकता है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश में आवंटित हो रहे कोल ब्लाॅक की वजह से ओबरा डी परियोजना से एक रुपये प्रति यूनिट महंगी दर पर बिजली उत्पादन के कयास लगाए जा रहे हैं। इसे कम करने के लिए कोल ब्लाॅक का आवंटन पास के ही एनसीएल की कोयले की खदानों से किए जाने की प्रक्रिया की जा रही है। इसमें अभी कुछ देरी होने की वजह से ओबरा डी परियोजना का काम शुरू होने में भी देरी हो सकती है। साथ ही उन्होंने पानी की समस्या पर भी चर्चा की। कहा कि परियोजना को पानी उपलब्ध कराने के लिए सोन नदी से भी पानी लिफ्ट कराए जाने पर भी विचार किया जा रहा है। इसे लेकर सरकार व निगम प्रबंधन के बीच वार्ता का दौर जारी है।
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दूसरी इकाई से जल्द शुरू होगा कामर्शियल उत्पादन
ओबरा। उत्पादन निगम के प्रबंधक निदेशक डाॅ. रुपेश कुमार ने बताया कि ओबरा सी परियोजना की दूसरी इकाई से कामर्शियल उत्पादन के लिए उसमें आ रही तकनीकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास जारी है। बीच-बीच में इकाई को चालू कर समस्याओं पर लगातार निगहबानी की जा रही है। जल्द ही सभी तकनीकी पहलुओं में आने वाली समस्याओं को दूर कर इकाई से जल्द कामर्शियल उत्पादन शुरू कर लिया जाएगा।
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आग बुझाने के लिए 40 करोड़ से लगा था मल्सी फायर सिस्टम
सोनभद्र। वर्ष 2018 में ओबरा बी परियोजना के केबल गैलरी में भीषण आग लगी थी। इससे करोड़ों की क्षति पहुंची थी। घटना के बाद 40 करोड़ रुपये खर्च कर परियोजना में मल्सी फायर सिस्टम को लगाया गया था। बृहस्पतिवार को आईसीटी में आग लगने के बाद मल्सी फायर सिस्टम तत्काल सक्रिय हो गया था। हालांकि आग की भीषण ताप के कारण इसे भी क्षति पहुंची है।
14 अक्तूबर 2018 को 12वीं इकाई से उत्पादन शुरू करने के दौरान बी-परियोजना के केबल गैलरी में तेज धमाके के साथ आग लग गई थी। इसके चलते 9वीं, 10वीं, 11वीं इकाई भी ट्रिप हो गई। इस भीषण आग पर काबू पाने में सीआईएसएफ के जवानों को 12 घंटे तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। परियोजना को करोड़ों की क्षति भी पहुंची थी। इस घटना के बाद फायर ऑडिट करते हुए नए सिरे से मल्सी फायर फाइटिंग सिस्टम को स्थापित किया गया था। एक ऐसी अग्निशमन प्रणाली है, जो विभिन्न प्रकार की आग को बुझाने के लिए एक साथ कई तकनीकों का इस्तेमाल करती है। इसका उपयोग ट्रांसफॉर्मर या अन्य विद्युत संयंत्रों व औद्योगिक इकाइयों के फायर सुरक्षा के लिए किया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 65 डिग्री से अधिक तापमान होते ही यह सिस्टम स्वत: सक्रिय होकर पानी की बौछार करने लगता है, जिससे उपकरण का तापमान कम हो सके। बृहस्पतिवार को घटना के बाद मल्सी फायर सिस्टम सक्रिय तो हुआ, लेकिन लगातार आग के प्रचंड ताप की वजह से इससे जुड़े पाइप व अन्य उपकरण भी क्षतिग्रस्त हुए हैं।
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वर्जन...
ओबरा परियोजना में फायर फाइटिंग से जुड़े सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध थीं। मल्सी फायर सिस्टम क्रियाशील था। इसकी नियमित ऑडिट भी होती रही है। घटना के तुरंत बाद यह सक्रिय भी हो गया था। तकनीकी फाल्ट की वजह से आग लगी थी। फायर फाइटिंग सिस्टम सुदृढ़ होने से उसे नियंत्रित कर लिया गया। -श्रीराम साहनी, मुख्य अग्निशमन अधिकारी।
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