जिले में सस्ते गल्ले की दूकानों के संचालक अनाजों की खुलेआम कालाबाजारी कर रहे हैं। खासकर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा से सटे इलाकों के कोटेदार गरीबों को अनाज तक नहीं देते। इससे विवश होकर लोग सैकड़ों किमी की दूरी तय कर कलेक्ट्रेट प्रदर्शन करने के लिए जाते हैं। विभागीय स्तर पर जांच और कार्रवाई की जाती है लेकिन कालाबाजारी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
जिले में सस्ते गल्ले की दूकानों से प्रति माह सैकड़ों टन अनाजों की कालाबाजारी होती है। गरीबों को बांटने के लिए मिलने वाला अनाज और मिट्टी तेल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के कार्डधारकों को सरकार की इस अति महत्वाकांक्षी योजना का लाभ सही मायने में नहीं मिल पाता आए दिन तहसीलों और कलेक्ट्रेट पर धरना प्रदर्शन होता है।
कई बार कालाबाजारी के लिए जा रहा अनाज खुद ग्रामीणों ने पकड़कर पुलिस के हवाले किया फिर भी स्थिति जस की तस है। कोटेदारों के भ्रष्टाचार के कारण कार्डधारक परेशान होते हैं। पिछले दिनों कलेक्ट्रेट पर बुड़हर कला, नकतवार, सिकरवार, करौंदिया, सिरविट आदि गांवों के कार्डधारकों ने कोटेदारों के भ्रष्टाचार और मनमानी से परेशान होकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया था।
पड़ोसी राज्य में सीमा से सटी ग्राम पंचायतों के ग्रामीण आसानी से अनाज और मिट्टी तेल की कालाबाजारी करते हैं। दो माह में एक माह का गल्ला बांटकर वे बाकी अनाज बेंच देते हैं। इसकी अक्सर शिकायत डीएम से लगायत अफसरों तक होती है।