ओबरा परियोजना से निकलने वाली राख जो गोठानी के पास सोन नदी में मिल जाती है।
उत्तराखंड आपदा के पर्यावरण कारणों की जांच से जुड़ी कमेटी की अगुवाई कर चुके तथा पीसीआई (लोक विज्ञान संस्थान) के संस्थापक निदेशक रवि चोपड़ा की अगुवाई वाली टीम ने बुधवार और गुरुवार को सिंगरौली रीजन (ऊर्जांचल परिक्षेत्र) के अनपरा, रेणुकूट, म्योरपुर, डाला आदि क्षेत्रों का दौरा किया। जगह-जगह पर्यावरण मित्र के रूप में चिह्नित किए गए युवकों से मुलाकात कर प्रदूषण पर अंकुश के उपायों को लेकर चर्चा की। इस दौरान ऊर्जांचल में व्याप्त प्रदूषण तो चर्चा का विषय रहा ही, सोन नदी के जरिए गंगा तक प्रतिवर्ष पहुंचती हजारों टन राख एवं अन्य अवशिष्टों का भी मसला छाया रहा।
वर्ष 2009 से 2013 तक नेशनल गंगा रिवर अथारिटी के सदस्य रह चुके रवि चोपड़ा का कहना था कि ऊर्जांचल में प्रदूषण की स्थिति काफी खराब है। खासकर ओबरा के पास रेणुका नदी से होकर सोन नदी में बहती परियोजना की राख एवं अन्य औद्योगिक अपशिष्ट बारिश के समय में बहकर गंगा में शामिल हो जाते हैं, जिसका गंगा पर सीधा असर पड़ रहा है। इस पर अविलंब रोक लगाने की जरूरत है। उन्होंने गंगा की स्वच्छता पर अब तक किए गए प्रयासों को महज खानापूर्ति बताया। केंद्र-प्रदेश सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि मौजूदा समय में विकास के लिए जो भी कार्ययोजना बनाई जा रही है, उसमें पर्यावरण संरक्षण का ख्याल नहीं रखा जा रहा है। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जो पर्यावरण हित में हो। जब तक सरकारें उद्योग हित से अलग हटकर नहीं सोचेंगी, तब तक पर्यावरण संरक्षण की बात बेमानी सी बनी रहेगी। गंगा की स्वच्छता के लिए तप कर चुके स्वामी सानंद, दिल्ली से आए हजार्ड्स सेंटर के निदेशक दुन्नू राय, पीसीआई देहरादून के वैज्ञानिक एके गौतम ने हालात पर चिंता जताई। कहा कि हालात पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।