ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद से गांव में सुख-समृद्धि बनी हुई है। बैरखड़ जनजाति बहुल गांव है। यहां होली के मौके पर पारंपरिक वाद्ययंत्र मानर की थाप पर पुरुष और महिलाएं सामूहिक नृत्य करते हैं। समूह में एक-दूसरे को अबीर लगाते हुए गीत-नृत्य की परंपरा आज भी कायम है। महिलाएं भी बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाती हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि उनकी जनजाति का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है और वे हर त्योहार अपनी परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार मनाते हैं। पूर्व प्रधान अमर सिंह गोंड, मनरूप गहवां, छोटेलाल सिंह, रामकिशुन सिंह व लाल मोहन गोंड बताते हैं कि पूर्वजों से मिली परंपरा के अनुसार होली नियत तिथि पर नहीं मनाई जाती।
वर्षों पहले अनहोनी के बाद बैगा ने तिथि परिवर्तन की सलाह दी, जिसे गांव ने स्वीकार कर लिया। होलिका दहन गांव के बैगा के हाथों कराया जाता है। जिस स्थान पर यह अनुष्ठान होता है, उसे ‘संवत डाड़’ कहा जाता है। होलिका दहन के अगले दिन ग्रामीण राख उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हैं और अपने इष्ट देव की आराधना व पूजा-पाठ करते हैं।