सोनभद्र। बघाड़ू निवासी बहादुर अली से शादी कर 46 साल पहले रजिया बनने वाली दुलारी आखिर तक खुद को जनजाति समाज का ही होने का दावा करती रही। 40 साल पहले झारखंड में जाकर कोर्ट मैरिज की। फिर भी पहचान बदलने के 32 साल बाद (2012 में) उसने अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करा लिया। जब जिला स्तरीय जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने जांच शुरू की। तब भी रजिया की ओर से दावा किया गया कि उसने बहादुर अली से कभी निकाह नहीं किया, न कभी नमाज अदा किया और न ही कभी मस्जिद गई। खुद को हिंदू बताती रही। प्रधान अब्दुल्ला अंसारी, बीडीसी, तीन ग्राम पंचायत सदस्य सहित 11 के बयान ने पूरी कहानी पलट दी। जांच के दौरान समिति ने पाया कि रजिया मुस्लिम धर्म अपनाते हुए उसी धर्म के रीति-रिवाज भी निभा रही है। बेटों के भी नाम उसी आधार पर रखे गए हैं। दर्ज कराए गए बयानों में पनिका समाज से बहिष्कृत किए जाने का भी दावा किया गया। इसके आधार पर जिला स्तरीय समिति ने 14 दिसंबर 2012 को जारी प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। समिति के अध्यक्ष के रूप में डीएम, सदस्य सचिव के रूप में जिला समाज कल्याण अधिकारी और सदस्य के रूप में एडीएम, एसडीएम रॉबर्ट्सगंज, जिला अल्पसंख्यक अधिकारी और तहसीलदार दुद्धी ने जाति प्रमाणपत्र के संबंध में सामने आए दावे और तथ्यों की पड़ताल की। रजिया का दावा था कि उसने बहादुर अली के सामने प्रस्ताव रखा था कि वह उसके साथ बतौर पत्नी रहेगी लेकिन अपना धर्म-जाति नहीं छोड़ेगी। इसी क्रम में 1986 में दोनों के बीच सहमति पत्र भी रजिस्टर्ड कराया गया। बहादुर अली का बयान था कि वर्ष 1986 में दोनों गढ़वा (बिहार) के रजिस्ट्रार के समक्ष पेश हुए और पति-पत्नी के रूप में जीवन बिताने का फैसला लिया। जमीन खरीदने से पहले जाति प्रमाणपत्र बनवाने की आवश्यकता पड़ी तो उसने रजिया का पिछड़ी जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन किया लेकिन तहसील अधिकारी-कर्मचारी ने जांचोपरांत अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र जारी किया। उपरोक्त दावों का सच जानने किए राजस्व टीम बघाड़ू पहुंची तो प्रधान अब्दुल्ला अंसारी ने पुष्टि की कि रजिया मुस्लिम रीति-रिवाज का पालन करती है। त्योहार भी मनाए जाते हैं। बीडीसी लोकनाथ, ग्राम पंचायत सदस्य बिहारी, जगदेव, लालमन सिंह, आदिवासी दयाशंकर, मुन्नालाल, रामफल, अशर्फीलाल, अमृत सिंह, गोविंद आदि ने भी दावा किया कि वह मुस्लिम त्योहार, रीति-रिवाज का पालन करती है। उसका पहनावा मुस्लिम महिलाओं की तरह है। इस बात का भी दावा किया गया है कि वह हिंदू धर्म के रीति-रिवाज, त्योहारों को नहीं मनाती। इस कारण उसे पनिका समाज से बहिष्कृत कर दिया गया है।
एसटी प्रमाणपत्र के लिए जनजातीय पहचान के आवश्यक गुण जरूरी : सत्यापन टीम
जिला स्तरीय जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति की जांच में पाया गया कि दुलारी 46 साल वर्ष 1980 में ही रजिया बन चुकी थी। बाद में उसने कोर्ट मैरिज की और मुस्लिम धर्म से जुड़े रीति-रिवाज निभाने शुरू कर दिए। जारी निर्णय में कहा गया कि अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र के लिए आवेदक में जनजातीय पहचान के आवश्यक गुण होने चाहिए। इसमें प्रथागत रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय की स्वीकृति शामिल हैं। यदि धर्मांतरण या बाद के किसी आचरण के चलते जनजातीय जीवन शैली से पूर्ण अलगाव हो जाता है और समुदाय से मिलने वाली मान्यता खत्म हो जाती है तो अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त करने का मूल आधार भी समाप्त माना जाएगा।
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जिला स्तरीय सत्यापन समिति के निर्देश पर रजिया का जाति प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया गया है। संबंधित को इसकी जानकारी भी दे दी गई है। -अंजनी कुमार गुप्ता, तहसीलदार।