आजादी के 69 वर्ष बाद भी भाठ क्षेत्र (अनपरा इलाके का ग्रामीण अंचल) में अब भी पानी का संकट बना हुआ है। यहां प्रतिवर्ष पानी टैंकर के नाम पर जल निगम, ग्राम पंचायत और परियोजनाओं के सीएसआर कोटे से लाखों के वारे-न्यारे जरूर हो जाते हैं, लेकिन समस्या जस की तहस बनी है। इससे निजात के लिए वर्ष 2014 में 50 करोड़ की पेयजल परियोजना का प्रस्ताव बनाया गया था, लेकिन अब तक यह पहल मूर्तरूप नहीं ले सकी है।
तीस से चालीस किमी एरिया वाले भाठ क्षेत्र में क्षेत्रफल के मामले में प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत कुलडोमरी का दो तिहाई हिस्सा, रणहोर, योगेंद्रा आदि स्थित है। इस एरिया के पूरब-पश्चिम बिजली परियोजनाएं, उत्तर में कभी एशिया का सबसे बड़े एल्युमीनियम कारखाने का दर्जा रखने वाली परियोजना, दक्षिण में मिनी रत्न कंपनी एनसीएल स्थित है। बावजूद पेयजल जैसी महत्वपूर्ण जरूरत के लिए तपिश के तीन महीने बूंद-बूंद के लिए संघर्ष करना यहां के बाशिंदों की नियति बन चुकी है। प्रदूषण का जहर पीने के बावजूद इस एरिया का एक भी गांव प्रदूषण प्रभावित गांव का दर्जा नहीं पा सकी है। ना ही आरओ प्लांट, पेयजल परियोजनाएं जैसी सुविधा इस इलाके में मयस्सर हैं। इस कारण तपिश (मार्च) के शुरुआत के साथ यहां की जिंदगी चुआड़ और नालों के पानी पर टिक जाती है। इस एरिया को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 2014 में अनपरा से सटे डिबुलगंज में पेयजल परियोजना का प्रस्ताव बना। 50 करोड़ लागत तय हुई। जल निगम के निर्माण शाखा ने सर्वे किया लेकिन बाद में पहल ठंडे बस्ते में चली गई। अभी भी पानी टैंकर के नाम पर प्रतिवर्ष विभिन्न मदों से लाखों खर्च का क्रम जारी है।