एटा में हुए स्कूली बस हादसे से स्कूल में चलने वाली बसों को लेकर फिर बहस तेज हो गई है। विभाग से कड़ाई करने की मांग की जा रही है। जिले में भी स्कूली बच्चों की सुरक्षा खतरे में है। क्षमता से अधिक बच्चों को खटारा बसों में ढोया जा रहा है। अधिकांश स्कूली बसों के साइड शीशे में जाली नहीं है। पुलिस और परिवहन विभाग के अफसर इस पर कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे हैं।
उपसंभागीय परिवहन कार्यालय में 170 बस एवं 100 चार पहिया स्कूली वाहन पंजीकृत हैं। स्कूली वाहनों का कलर पीला व चालकों के अलावा एक असिस्टेंट होना चाहिए। साइड शीशे में जाली, फर्स्टएड बाक्स, सीज फायर व चालकों का कार्मिशयल लाइसेेंस होना जरूरी है। प्रत्येक वाहन पर चालक के अलावा एक असिस्टेंट तैनात होने चाहिए। बड़ी बसों में 52 से 60 बच्चें और मीडियम बसों में 18 से 40 बच्चें ले जाने की क्षमता है। लेकिन जिले में नियमों को ताख पर रखकर अधिकांश स्कूली वाहन संचालित हो रहे है। क्षमता से अधिक वाहनों में बच्चों को ढोया जा रहा हैै। जबकि अभिभावकों से मनचाहा किराया वसूल जा रहा है।
पांच प्रतिशत भी बसों में जाली तक नहीं है, फिर भी जिम्मेदरान मौन धारण किए हुए है। हालांकि गुरुवार को एटा में स्कूली बस और ट्रक में हुई भिड़ंत के बाद जिले के परिवहन विभाग की नींद टूटी गई है। एआरटीओ अवधेश सिंह ने कहा कि वर्ष 2016 में नियमों को ताख पर रखकर संचालित हो रहे करीब 50 बसों का चालान किया गया था। जिन स्कूलों के वाहन चल रहे है उनके प्रधानाचार्य को जल्द नियमानुसार वाहनों को संचालित करने के लिए नोटिस भेजी जाएगी। क्षमता से अधिक बच्चों को ढोने वाले वाहनों के मालिकों और संबंधित विद्यालय के प्रधाचार्य के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।