जिले में आत्महत्या की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कहीं कोई फांसी लगाकर जान दे देता है तो कहीं जहर के सेवन से अपना जीवन खत्म कर लेता है। जान देने वालों में सिर्फ व्यस्क ही नहीं, बल्कि 14-17 साल की आयु वाले किशोर भी शामिल हैं।
आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं समाज के लिए चिंता का सबब बनती जा रही हैं। खासतौर से किशोर और युवा वर्ग में इस प्रवृत्ति को बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया से गहरे लगाव और अपनों से दूरी को कारण माना जा रहा है।
वर्ष 2021 में 165 घटनाएं सामने आई थीं तो वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 206 हो गई। वर्ष 2023 में भी आत्महत्या के मामले में 225 के करीब रहे। वर्ष 2024 में भी स्थिति ऐसी ही है।
पिछले आठ महीनों में डेढ़ सौ से अधिक लोग अपनी जान दे चुके हैं। यह वह मामले हैं, जो किसी रिकॉर्ड तक पहुंचे। ग्रामीण क्षेत्र में होने वाली तमाम घटनाओं में लोग पुलिस को सूचना दिए बिना शव का अंतिम संस्कार भी कर देते हैं।
जान देने वालों में 60-65 फीसदी तक संख्या 40 वर्ष से कम आयु वालों की हैं। डॉक्टरों का मानना है कि वास्तविकता को दरकिनार कर दिखावे में फंसना युवाओं में आत्महत्या की बड़ी वजह है। सुविधाभोगी दौर में युवा वर्ग में धैर्य और जूझने की प्रवृत्ति कम हो रही है।
वह जल्दी से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं और ऐसा न होने पर टूट जाते हैं। आवेश में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों की मानसिक दशा पर निगरानी रखनी चाहिए।
सोच को सकारात्मक बनाएं, खुद को व्यस्त रखें
जिला अस्पताल की मानसिक रोग विशेषज्ञ डाॅ. रिचा पांडेय बताती हैं कि ओपीडी में हर रोज 45-50 मरीज आते हैं। इसमें 10-15 प्रतिशत ऐसे मरीज होते हैं, जो अवसाद या निराशा से ग्रसित होते हैं। उनके मन में बार-बार आत्महत्या का विचार आता है। ऐसे मरीजों को काउंसिलिंग के जरिए सामान्य बनाने का प्रयास किया जाता है। बताया कि जिले में पुरुषों में आत्महत्या की ज्यादातर घटनाओं के पीछे नशाखोरी, आर्थिक तंगी है। वहीं महिलाएं घरेलू विवाद या परिवार के सदस्यों के व्यवहार से अवसाद में आकर ऐसे कदम उठा रही हैं। किशोरों में आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह मोबाइल से उनका ज्यादा लगाव है। जिस कारण उनमें धीरे-धीरे लोगों से मिलने-जुलने की प्रवृत्ति कम होने लगती है। वह मुश्किल समय में तुरंत धैर्य खो देते हैं। ऐसे समय में अभिभावकों को सतर्क होने की जरूरत है।
इन लक्षणों से करें पहचान
आत्महत्या अचानक से उठाया जाने वाला कदम नहीं है। इससे पहले व्यक्ति कई दिनों तक ऐसे हालात से गुजरता है, जिसमें उसे खुद का जीना मुश्किल लगता है। उस पर नकारात्मकता हावी हो जाती है। खाने-पीने में मन नहीं लगता। वह लोगों से कटकर रहने लगता है। अक्सर गुमशुम रहता है। बेचैनी और घबराहट, बात-बात में गुस्सा होना, खुद को खत्म करने की धमकी देना जैसे लक्षण उसके व्यवहार में दिखने लगते हैं।