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Sonebhadra News: बड़ी आबादी पर अस्थमा का खतरा, मेडिकल कॉलेज में रोज पहुंच रहे ऐसे लक्षण वाले 20 मरीज

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सोनभद्र। जिले की बड़ी आबादी पर अस्थमा का खतरा मंडरा रहा है। स्थिति यह है कि अस्थमा के लक्षणों वाले रोजाना करीब 20 मरीज मेडिकल कॉलेज पहुंच रहे हैं। सांस रोगियों को भी संख्या अच्छी-खासी बताई जा रही है। ज्यादातर सांस और अस्थमा के मरीज औद्योगिक अंचल (ओबरा, डाला, रेणुकूट, बीजपुर, अनपरा, शक्तिनगर) से हैं। स्थिति को देखते हुए उन्हें बगैर मास्क कार्य न करने, ड्यूटी पर जाते वक्त भी इसका ख्याल रखने, दिन में कम से कम दो बार भाप लेने की हिदायत दी जा रही है।
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मई के पहले मंगलवार को प्रतिवर्ष विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इस बार यह पांच मई को है। इसका उद्देश्य अस्थमा से बचाव के प्रति लोगों को जागरूक करना और उन्हें सही उपचार की जानकारी देना है। डॉक्टरों के मुताबिक यह एक क्रोनिक (दीर्घकालिक) श्वसन रोग है। सूजन की स्थिति बनने से फेफड़े की वायु नलिकाएं संकीर्ण हो जाती हैं जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है। प्रभावित मरीज को ज्यादातर मामलों में इन्हेलर लेने की सलाह दी जाती है क्योंकि यह टैबलेट से ज्यादा कारगर है और उसका शरीर पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव भी काफी कम है।
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बचाव के लिए इन बातों का रखें विशेष ख्याल...
- तमाम लोगों को मौसम से एलर्जी होती है। जब भी मौसम में उतार-चढ़ाव की स्थिति बनती है या फिर वह धूल या परागगण के संपर्क में आते हैं तो नजले की स्थिति बन जाती है या फिर काफी छीकें आती हैं। ऐसे लोगों को विशेष सतर्कता बरती चाहिए क्योंकि ऐसे समय में अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। अस्थमा के मरीजों में इनकी संख्या 10 से 40 फीसदी तक मानी जाती है।
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- बचपन में बच्चों के सेहत खासकर किशोर उम्र के बेटे-बेटियों को मोटापा से बचाएं। लड़कियों के मामले में यह अस्थमा का एक बड़ा कारण माना जाता है। ऐसे लोगों को अगर इस बीमारी ने चपेट में ले लिया तो उसे नियंत्रित करना चुनौती बन जाता है।

- तीसरा प्रमुख कारण धूम्रपान और पैसिव स्मोकिंग है। इसलिए धूम्रपान से बचने के साथ ही धूम्रपान कर रहे व्यक्ति के पास खड़े रहना भी जोखिम भरा है। वायु प्रदूषण वाले इलाके भी इसके लिए खासे जोखिम भरे माने जाते हैं।
- आनुवांशिकता भी इस रोग का एक अहम कारण है। माता पिता में से किसी को भी अस्थमा है तो बच्चे के लिए जोखिम 25 से 30 फीसद तक बढ़ जाता है। अगर माता-पिता दोनों अस्थमा पीड़ित हैं तो यह खतरा 50 फीसद तक पहुंच जाता है।
इन लक्षणों का रखें ध्यान, ऐसे करें बचाव
सांस फूलना, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज, छाती में जकड़न, रात और सुबह में खांसी की स्थिति हो तो सतर्क हो जाएं। धूल, धुआं और एलर्जी से बचाव करें। धूल वाले इलाकों में मास्क लगाकर ही जाएं। धूम्रपान न करें, न ही धूम्रपान करने वाले व्यक्ति पास खड़े रहे हैं। उपरोक्त से कोई भी लक्षण हैं तो तत्काल चिकित्सक संपर्क कर दवा लें। टीकाकरण कराएं। इस भ्रांति से दूर रहें कि इन्हेलर लेने से उसकी लत लग जाती है। डॉक्टरों की राय में अस्थमा होने या इससे मिलते-जुलते लक्षणों के समय यह ज्यादा प्रभावकारी होता है। इस असर सीधे फेफड़े पर पड़ता है जिससे बीमारी नियत्रित रहती है। अस्थमा है तो वह पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
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इसके लिए रेडजोन माने जाते हैं औद्योगिक अंचल :
श्वांस रोगियों के लिए औद्योगिक अंचल रेड जोन माने जाते हैं। चूंकि जिला औद्योगिक प्रधान है और संबंधित इलाकों में अधिक गर्मी और धूल की स्थिति बनती है। इसलिए यहां क्रशर और कारखानों वाले इलाके में इसका खतरा ज्यादा है।
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अस्थमा पूर्णतः नियंत्रित होने वाली बीमारी है। इसके लिए मरीज को नियमित सही तकनीक से इन्हेलर का उपयोग करते रहना चाहिए। बगैर डॉक्टर की सलाह के दवा बंद न करें। - डॉ. राहुल सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग, मेडिकल कॉलेज
अस्थमा रोगियों के इन्हेलर सबसे ज्यादा कारगर है। इसका प्रयोग सामान्य जीवन जीने में मदद करता है। ऐसी स्थिति में खुद को तनाव से बचाए रखना जरूरी है। -डॉ. नागेंद्र कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, रेस्पिरेट्री मेडिसीन विभाग, मेडिकल कॉलेज।

गर्म जलवायु और ज्यादा धूल बच्चों को भी अस्थमा का मरीज बना रही है। इसको देखते हुए सचेत रहने की जरूरत है। अभिभावकों में जागरूकता भी बढ़ी है और प्रभावित मरीजों के लिए मीटर डोज वाले इन्हेलर का प्रयोग भी तेजी से बढ़ा है। डॉ. मीनाक्षी पांडेय, असिस्टेंट प्रोफेसर डिपार्टमेंट ऑफ पीडियाट्रिक्स, मेडिकल कॉलेज।
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