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रिहंद जलाशय में बहाई जा रही बिजली घरों की राख

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एनजीटी की सख्त हिदायतों के बाद ऊर्जांचल के बिजली घरों की राख को रिहंद जलाशय में गिराने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ है। परियोजनाओं की ओर से बेधड़क गीली राख को पानी के साथ रिहंद जलाशय में बहाया जा रहा है। इससे रिहंद का पानी दूषित हो रहा है। एनजीटी की कार्रवाई से बचने के बाद बार-बार नियमों का पालन करने की दलील देने वाले परियोजना प्रबंधन का झूठ उजागर हो गया है। गर्मी के कारण बांध का जलस्तर घटने से जगह-जगह राख के बड़े-बड़े टीले बन गए हैं जो नियमों के उल्लंघन की कहानी को साफ बयां कर रहे हैं।
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एशिया के बड़े जलाशयों में शुमार गोविंद वल्लभ पंत सागर (रिहंद जलाशय) में पावर प्रोजेक्टों से उत्सर्जित राख बहाने का मामला कोई नया नहीं है। वर्षों से परियोजनाएं इसी सागर में राख का बहाव कर रही है। आम मौसम में पानी ज्यादा होने पर पानी में राख बहाने का मामला दबा रहता है। इस बार रिकार्ड गर्मी के कारण जलस्तर में तेजी से गिरावट के साथ पावर परियोजनाओं की कारस्तानी भी सामने आने लगी है। राख के उत्सर्जन को रोकने के लिए कई बार गैर सरकारी संस्थाओं ने सक्रिय होकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का सहारा भी लिया। एनजीटी की ओर से इस पर सख्त हिदायतें भी दी गईं। इसके बावजूद परियोजनाओं की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही। अब स्थिति यह है कि जलाशय के किनारों पर हर ओर राख के टीले जम गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस मामले में उदासीनता बरत रहा है। स्थिति यह है कि जल स्तर में गिरावट के साथ किनारों पर जमा लाखों टन राख प्रोजेक्टों की मनमानी बयान कर रही है। इस जलाशय से करीब कोयला आधारित बिजली घर स्थापित हैं। इसमें एनटीपीसी, यूपी पावर कारपोरेशन, लैंको, हिंडाल्को व रिलायंस के पावर प्लांट शामिल हैं।
एनजीटी के हस्तक्षेप पर भी मनमानी जारी
पावर प्रोजेक्टों से उत्सर्जित राख को जलाशय में बहाने के मामले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दायर याचिका पर सेवानिवृत्त न्यायाधीश राजेश कुमार की अध्यक्षता में ओवर साइट कमेटी का गठन किया गया। कमेटी के अध्यक्ष व सदस्यों ने अपनी आंखों से पावर व कोयला प्रोजेक्टों की मनमानी देखा। सदस्यों ने जलाशय में राख बहाने को गंभीर माना और समय समय पर संबंधितों को निर्देशित किया। इसके बावजूद मनमानी नहीं रुकी। जलाशय के खिसकते जलस्तर ने मनमानी को बेपरदा किया तो जिम्मेदार कुछ बोलने से कतरा रहे हैं। राख के पानी में मिलने से पानी प्रदूषित हो रहा है। जलाशय की संग्रहण क्षमता भी लगातार कम हो रही है।
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परियोजना क्षेत्रों से सटे जलाशय के किनारों की हर तीन माह पर जांच की जाती है और दोषी पाए जाने पर उचित कार्रवाई भी की जाती है। उत्सर्जित राख को जलाशय में छोड़े जाने का मामला अब तक हमारे संज्ञान में नहीं है। मंगलवार 10 मई से क्षेत्र का साप्ताहिक निरीक्षण कराया जाएगा। दोषी पाए जाने पर परियोजनाओं के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी। जिस किसी भी व्यक्ति को समस्या हो वह साक्ष्य प्रस्तुत कर इस एक सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रख सकता है।- डॉ. टीएन सिंह, क्षेत्रिय प्रदूषण अधिकारी

बेलवादह में रिहंद जलाशय के किनारे पर जमी राख।- फोटो : SONBHADRA

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