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जाति-पाति पर नहीं व्यवहार पर मिलता था वोट

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सोनभद्र। पहले जाति-पाति पर नहीं प्रत्याशियों के व्यवहार पर उन्हें वोट मिलता था। सांसद बनने के बाद चुनावी वादों को पूरा करने के लिए जिले से लेकर दिल्ली तक संघर्ष करते थे। आम जनता अपने सांसद से मिलकर तकलीफों को सुनाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। सांसद से मिलने के लिए इंतजार करना पड़तार है। यह कहना लोक सभा चुनाव में कई बार मतदान कर चुके बुजुर्गों का है।
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राबर्ट्सगंज के नई बस्ती निवासी अशोक कहते हैं कि पहले चुनाव लडने वाले प्रत्याशी समस्याओं को मुद्दा बनाकर प्रत्येक मतदाताओं के घर जाकर मुलाकात कर अपने विचारों को उनके समक्ष रखते थे। प्रचार के दौरान प्रत्याशी अपने समर्थकों के यहां रात गुजारते थे। सांसद बनने के बाद भी वह अक्सर जन चौपाल लगाकर जनता से मुखातिब होकर उनकी समस्याएं सुनते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे अधिकांश उम्मीदवार के पास कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। हर्ष नगर निवासी हरिश्चंद्र कहते हैं कि अब त केवल पैसा का चुनाव रह गईल बा। जीतने के बाद अधिकांश जनप्रतिनिधि जनता से मुंह मोड़ कर अपना और अपने लोगों के विकास को लेकर परेशान रहते है। उन्हें जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। इसका ताजा उदाहरण राबटर्सगंज से गुजरने वाला फ्लाईओवर है। अभी तक ओवरब्रिज के नीचे सर्विसलेन सड़क का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हुआ है।जब जिला मुख्यालय का यह हाल है तो दुरूह-नक्सल क्षेत्र के समस्याओं को लेकर माननीय कितने गंभीर होंगे इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। पहले जनप्रतिनिधि जनहित की समस्याओं को लेकर गंभीर रहते थे।
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