सोनभद्र। खादी, जिसकी बुनावट में स्वदेशी संघर्ष की गूंज और सादगी की सुगंध थी, आज आधुनिक बाजार के शोर में अपनी पहचान खोता जा रहा है। कभी जिले के बाज़ारों में खादी की चमक थी, लेकिन अब यहां की दुकानें एक-एक कर बंद होती जा रही हैं। पिछले एक दशक में जिले में खादी की दस दुकानें या तो पूरी तरह बंद हो गईं या किराये पर किसी और व्यापार में बदल गईं।
गांधी आश्रम सैदपुर गाजीपुर के अधीन जिले में दस से अधिक दुकानें संचालित थीं। वहीं स्मारक निधि संस्था की ओर से भी जिले में छह से आठ दुकानों का संचालन किया जाता है। हालांकि समय के साथ 90 फीसदी दुकानें बंद हो चुकी हैं। पूर्व में घोरावल, रामगढ़, चोपन, रेणुकूट, दुद्धी, शाहगंज, सलखन, चुर्क, म्योरपुर,ओबरा सहित जिले के प्रमुख बाजारों में दुकानें थीं। मगर वर्तमान में गांधी आश्रम के अधीन राॅबर्ट्सगंज एक, गांधी स्मारक निधि वितरण केंद्र राॅबर्ट्सगंज और बनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर में ही दुकानें व्यवस्थित ढंग से चल रही हैं। जबकि कुछ एक दुकानें फाइलों में चल रही हैं। जो दुकानें चल रही हैं, यहां की बिक्री पूर्व के सालों की तुलना में 50 फीसदी तक गिर गई हैं। दुकानों के कर्मी जब सेवानिवृत्त हुए तो उनकी जगह पर नए कर्मी तैनात नहीं हो सके। संचालक बताते हैं कि आज की पीढ़ी के लिए खादी पुराना फैशन है। दाम भी ज्यादा लगता है, जबकि मॉल में और ऑनलाइन, सिंथेटिक कपड़ों के ढेरों सस्ते विकल्प मिल जाते हैं। ऐसे में हम कहां टिक पाएंगे। दुकानें चलाने वाले कुछ परिवार अब पूरी तरह से दूसरे कारोबार फर्नीचर, गारमेंट शॉप या किराना में शिफ्ट हो चुके हैं।
युवा पीढ़ी में खादी की पकड़ ढीली
शादी समारोह से लेकर रोजमर्रा के पहनावे तक, खादी की जगह तैयारमाल कपड़ों और ब्रांड्स ने ले ली है। युवा वर्ग आज लुक्स, ट्रेंड और इंस्टेंट डिलीवरी को महत्व दे रहा है। वैसे भी ऑनलाइन पोर्टल्स और ब्रांडेड ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने लोगों को आसानी और विविधता के साथ सस्ते विकल्प उपलब्ध कराए हैं। ऐसे में खादी ग्रामोद्योग की तरफ से बेहतरीन समर्थन और मार्केटिंग के वादे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ठीक उलट है। जिले में ना तो प्रचार–प्रसार है, न युवाओं के लिए कोई प्रोत्साहन अभियान। कुछ दुकानदारों के अनुसार, सरकारी मेले में दो-चार दिन खूब शोर रहता है, फिर खामोशी।
ये है उम्मीद
स्थानीय लोगों के मुताबिक अगर स्कूल यूनिफॉर्म, सरकारी यूनिफॉर्म और औपचारिक उपयोग में खादी को बढ़ाया जाए, तो इसका बाजार विस्तार पा सकता है। इसके लिए सरकार स्थानीय अधिकारियों के यूनिफॉर्म में खादी को जरूरी कर सकती है।
जिले में खादी की बिक्री की तीन दुकानें संचालित हैं। पूर्व में कई दुकानें बंद हो गई थीं। विभाग की ओर से हर संभव सहयोग दिया जाता है। पिछले कुछ साल में नई दुकानों के लिए आवेदन नहीं मिले हैं। -गौतम त्रिपाठी, जिला ग्रामोद्योग अधिकारी।