सोनभद्र। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने शुक्रवार को आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट से जुड़ी आदिवासी वनवासी महासभा बनाम यूनियन आफ इंडिया और 16 अन्य की जनहित याचिका में निर्णय देते हुए वनाधिकार कानून के तहत दावा करने वाले आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों की बेदखली पर रोक लगा दी है। साथ ही केंद्र औैर राज्य सरकार से इस पर अगली सुनवाई पर जवाब-तलब किया हैै।
अपने दिये आदेश में मुख्य न्यायाधीश दिलीप बी भोसले और न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने केंद्र व राज्य सरकार से आदिवासी वनवासी महासभा द्वारा पूर्व में दाखिल जनहित याचिका में पांच अगस्त 2013 को दिए आदेश में की गई कार्रवाई और अनुसूचित जनजाति व अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) के संशोधित नियम 2012 के नियम 12 (क) के प्रावधानों के तहत वन अधिकारों की मान्यता के लिए अपनाई गयी प्रक्रिया के बारे में अगली सुनवाई तक शपथ पत्र के साथ बताने को कहा है। तब तक वनाधिकार कानून के तहत दावा करने वाले दावेदारों की बेदखली पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय में आदिवासी वनवासी महासभा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश अग्रवाल ने बहस की। यह जानकारी स्वराज अभियान की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य और याचिका कर्ता दिनकर कपूर ने दी है। बताया कि विगत दिनों स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में आदिवासी वनवासी महासभा और मजदूर किसान मंच की टीम ने नौगढ़, सोनभद्र और मिर्जापुर के कई गांवों में दौरा कर वनाधिकार कानून के अनुपालन की स्थिति की जांच पड़ताल की थी। जिसमें यह तथ्य सामने आया था कि वनाधिकार कानून के तहत जमा किए गए दावे ग्राम स्तर और उपखंड स्तर पर पड़े हुए हैं। उलटे योगी सरकार बनने के बाद सोनभद्र, मिर्जापुर व चंदौली में पुश्तैनी वन भूमि पर बसे आदिवासियों की बेदखली का अभियान वन विभाग और प्रशासन ने छेड़ दिया है। स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने फैसले का स्वागत किया हैै।