सोनभद्र। सोनभद्र की हवा, मिट्टी, पानी में प्रदूषण का जहर बढ़ता जा रहा है। 24 से अधिक गांवों में फ्लोराइड जनित फ्लोरोसिस बीमारी तीन पीढ़ियों से विकलांगता बांट रही है। वहीं मरकरी और आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों की बढ़ती मात्रा तेजी से लोगों को बीमार बना रही है। इसको लेकर कई शोध हुए। सीएसई (सेंटर फार साइंस एनवायरमेंट दिल्ली), पीएसआई (लोक विज्ञान संस्थान देहरादून), हजार्ड्स सेंटर नई दिल्ली, बनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर, आईआईएमएस (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली) की तरफ से बिगड़ते हालात को लेकर चिंता जताते हुए रिपोर्ट भी जारी की गई। एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की तरफ से निर्देश जारी किए गए। बावजूद प्रदूषण की भयावहता कम होने का नाम नहीं ले रही।
हवा, मिट्टी, पानी में बढ़ते प्रदूषण के चलते जहां सिंगरौली परिक्षेत्र (सोनभद्र और सिंगरौली का औद्योगिक अंचल) को देश का तीसरा सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र माना जा चुका है। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ मरकरी की अधिकता को देखते हुए अपने बोलचाल में इस एरिया को भारत का मिनिमाटा (मरकरी के चलते तबाह हुआ जापान का शहर) की संज्ञा देने लगे हैं। फ्लोराइड की अधिकता और इसके चलते दुद्धी, चोपन, म्योरपुर और बभनी ब्लाक के गांवों में विकलांग होती पीढ़ी को लेकर 20 साल पहले ही खुलासा हो गया था। तब से अब तक प्रभावी राहत के नाम पर ज्यादातर कागजी घोड़े ही दौड़ाए गए। इस दंश से निजात मिलती, इससे पहले 2012 में सीएसई ने सोनभद्र के रग-रग में पारे की मौजूदगी का खुलासा कर खलबली मचा दी। लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर बताया गया कि हवा, मिट्टी, पानी के साथ पशु, पक्षी, जानवर, पौधे सभी में मरकरी पैबस्त हो चुकी है। इसके बाद भी जिम्मेदार नियंत्रण के उपाय बनाने की बजाय इसे झुठलाने में लगे रहे। एनजीटी के निर्देश पर 2015 में कोर कमेटी ने जब विस्तृत अध्ययन किया तो यहां के वायुमंडल में हर दिन 14 किलो पारा घुलने की रिपोर्ट देकर सरकारी तंत्र को सोचने पर विवश कर दिया। हालात को देखते हुए सड़क मार्ग से कोयला ढुलाई रोकने, फ्लोराइड के विस्तृत अध्ययन के लिए दो केंद्र स्थापित करने, चिकित्सकों को विशेष ट्रेनिंग देने, अत्याधुनिक अस्पताल स्थापित करने जैसे कई सुझाव दिए गए। 2018 में एनजीटी ने इसके पालन के लिए स्पष्ट निर्देश भी जारी किए। नियमित निगरानी के लिए ओवरसाइट कमेटी गठित की। बावजूद एक भी सुझाव पर अब तक प्रभावी अमल नहीं हो पाया है। एनजीटी की सख्ती के बाद प्रभावित ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल के लिए आरओ प्लांट तो लगाए गए लेकिन पानी का बड़ा हिस्सा बर्बाद होने, अत्यधिक जल दोहन से बढ़ते प्रदूषण को रोकने को लेकर कोई उपाय अमल में नहीं लाए गए।
सोनभद्र। क्रशर प्लांट भी प्रदूषण का बड़ा कारक बने हुए हैं। खनन स्थल पर पौधरोपण, गिट्टी क्रस करते समय पानी छिड़काव आदि मानक निर्धारित किए गए हैं लेकिन शायद ही किसी क्रशर प्लांट पर इसका पालन होता नजर आता है। हालत यह है कि वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर डाला और बग्घानाला-ओबरा मार्ग पर तपिश में भी कोहरे की स्थिति बनी रहती है। यहां से बाइक, साइकल या पैदल गुजरने वालों का शरीर ही सफेद रंग में पुत जाता है। श्वांस संबंधी बीमारियां भी यहां तेजी से बढ़ रही हैं।
सोनभद्र। नदियों-जलाशयों में औद्योगिक अपशष्टि छोड़ने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई है लेकिन जिले में यह निर्देश कई स्थानों पर हवा-हवाई साबित हो रहा है। अनपरा में जहां बेलवादह के पास परियोजना से उत्सर्जित कोयले की राख रिहंद डैम में पहुंच रही है। वहीं ओबरा में रेणुका नदी और इसके जरिए सोन नदी में हर रोज राख की बड़ी खेप गिर रही है। लभरीगाढ़ा के पास एक फैक्ट्री से निकलता अपशिष्ट भी नाले के जरिए रिहंद डैम में पहुंच रहा है।
सोनभद्र। 2012 में सीएसआई ने प्रदूषण प्रभावित चिल्काटांड़ के आठ, डिबुलगंज के पांच, खैराही-किरवानी के तीन और ओबरा के तीन कुल 19 लोगों के रक्त, बाल और नाखून के नमूने लिए थे। इसमें औसतन प्रत्येक व्यक्ति के ब्लड में 34.30पीपीबी, बाल में 7.39 और नाखून में 0.83 पीपीएम मरकरी (पारा) मौजूद मिली थी। जबकि मानक 0.001पीपीएम है। चिल्काटांड़ की सरजू निशा के ब्लड में मरकरी की मात्रा 78.68पीपीबी तक पाई गई थी। उसे चमड़ी सफेद होने सहित अन्य बीमारियां थी। वहीं शेष में किसी को बदन दर्द, जोड़ों में दर्द, फोड़े, किडनी-पेट की दिक्कत, पैरों में सूजन, शरीर में जलन परेशान किए हुए थी।
सोनभद्र। व्यक्ति के शरीर में ही नहीं, दूध और शहर में भी पारा (मरकरी) पाया जा रहा है। बनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर और लोक विज्ञान संस्थान देहरादून की जून 2016 की रिपोर्ट बताती है कि मानक 0.001पीपीएम के मुकाबले गोविंदपुर के दूध में 0.003, फरीपान में 0.009 और अनपरा में 0.007पीपीएम मरकरी मिली थी। वहीं जून 2016 में उठाए गए शहद के नमूने में मरकरी की मात्रा में गोविंदपुर 0.0015, फरीपान में 0.005पीपीएम पाई गई थी। गोविंदपुर में दिसंबर 2016 में शहद की स्थिति जांची गई तो मात्रा बढ़कर 0.0023 हो गई।
सोनभद्र। एनजीटी कोर कमेटी की अगस्त 2015 की रिपोर्ट पर ध्यान दें तो सोनभद्र-सिंगरौली में हर दिन 2725 टन नाइट्रोजन आक्साइड यहां की आबोहवा में घुल रहा है। दावा किया गया है कि यहां 21 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए रोजाना जलाए जा रहे 315109 टन कोयल से हर दिन 14 टन मरकरी, 20 टन श्वसनीय धूलकण, 2394 टन सल्फर डाईआक्साइड उत्सर्जित हो रही है।
निर्देशों का जब तक जमीनी स्तर पर अमल नहीं होगा, तब तक सोनभद्र की स्थिति सुधरने वाली नहीं है। जरूरी है कि सड़क मार्ग से कोयला परिवहन रोकने के साथ ही राख उत्सर्जन का सही तरीका अपनाया जाए।
दुन्नू राय, निदेशक, हजार्ड्स सेंटर, नई दिल्ली।
सोनभद्र में हालात हर साल बिगड़ते जा रहे हैं। इसको लेकर कई बार शोध और रिपोर्टों के जरिए चेतावनी दी जा चुकी है। एनजीटी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से निर्देश भी जारी होते हैं, लेकिन जब तक इस पर प्रभावी अमल नहीं किया जाएगा, तब तक सार्थक परिणाम नहीं निकलने वाले हैं।
डा. अनिल गौतम, पर्यावरण वैज्ञानिक।