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अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं जनजातीय वर्ग के लोग

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बभनी। सेवा समर्पण संस्थान सेवाकुंज कारीडांड चपकी में गुरुवार को बिरसा मुंडा की 143 वीं जयंती मनाई गई। इसमें ओझा, बैगा, पुजारी और धर्माचार्य सम्मानित किए गए। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान बिरसा मुंडा के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्वलित कर किया गया।
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गोष्ठी में मुख्य अतिथि रमेश बाबू ने कहा कि जनजाति भाइयों का इतिहास आदि काल से चला आ रहा है। इन जनजाति लोगों की भूमिका सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग से चली आ रही है। ओझाई, सोखाई की परंपरा जनजातियों में शुरू से चली आ रही है। अब भी जनजाति वर्ग के लोग इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। जनजाति ओझा, सोखा, बैगा और पुजारी श्लोक और संस्कृत का उच्चारण नही करते। लेकिन उनके पूजा करने का उद्देश्य एक ही। जनजाति समाज के लिए बिरसा मुण्डा का जन्मदिन गौरवपूर्ण है।
कहा कि जिस समय राम वनवास में सीता हरण हुआ तो प्रभु राम ने अयोध्या से सेना नही बुलाया, बल्कि यही जनजाति कोल, भील, बंदर, भालू ने ही उनका साथ दिया और जीत दिलाया। धर्माचार्य रामनाथ ने कहा कि यह ओझाई, कअर्मा, सैला और मंतर जंतर का काम पूर्वजों से चला आ रहा है, जिस परंपरा को आज भी जिंदा रखे हैं और उस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। यह विलुप्त न हो इस लिए नयी पीढी को भी जोड़ने का प्रयास जारी है। उन्होंने कहा कि बिरसामुण्डा के जीवन शैली से बहुत कुछ सीख मिलता है। आज भी इस समाज मे बनवासियों, जनजातियों, आदिवासियों की अहम भूमिका है। गांवों में अब भी बैगा की पुजाई करने के बाद ही कोई भी कार्य की शुरुआत की जाती है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय श्रद्धा जागरण प्रमुख रायपुर छत्तीसगढ़ रमेश बाबू रहे जबकि अध्यक्षता धर्माचार्य गोडवाना महासभा रामनाथ नेे की। कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रातं संगठन मंत्री आनंद, डॉ. लखनराम जंगली, कृष्ण गोपाल, सीताराम, दीपनारायण सिंह, जवाहरलाल योगी, जदुवीर सिंह मौजूद रहे।
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