सोनभद्र। राबर्ट्सगंज के इमरती कालोनी में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के छठवें दिन बुधवार को अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराजश्री ने गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति नि:छल प्रेम का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गोपियां अद्भुत प्रेम की मूर्ति थीं। उनके हृदय रुपी राज्य में केवल श्री कृष्ण हैं। कितना गम्भीर प्रेम है इनका हृदय इनके बस में तो है ही नहींए निरंतर गोविन्द के पास रहता है। हर पल हृदय में उनकी बांसुरी बजती रहती है। घर में, कुंज में, यमुना के तट पर जहां भी रहती हैं, उनकी आँखें चितचोर को ही ढूढती रहती हैं। वो सामने न भी हो तो भी दिखते रहते हैं। महाराजश्री ने बताया कि कृष्ण बचपन में ही कई आकस्मिक दुर्घटनाओं का सामना करने तथा कंस के षड़यंत्रों को विफल करने के कारण बहुत लोकप्रिय हो गये थे। सारे ब्रज में इस छोटे वीर बालक के प्रति विशेष महत्त्व पैदा हो गई थी, लेकिन दूसरी ओर मथुरा का राजा कंस कृष्ण की इस ख्याति से घबरा रहा था और समझ रहा था कि एक दिन अपने ऊपर भी सकंट आ सकता है।
साम्राज्यवादी कंस ने अंत में कूटनीति की शरण ली और दानपति अक्रूर के द्वारा धनुर्याग के बहाने कृष्ण.बलराम को मथुरा बुलाने का विचार किया। अक्रूर अपने समय में अंधक.वृष्णि संघ के एक वर्ग का प्रसिद्ध नेता था। संभवतरू वह बहुत ही कुशल और व्यावहारिक ज्ञान सम्पन्न पुरुष था। कंस को उस समय ऐसे ही एक चतुर और विश्वस्त व्यक्ति की आवश्यकता थी।कार्यक्रम में शिव प्रसाद पांडेय, पारस नाथ पांडेय, ओम प्रकाश पांडेय, राममणि सारस्वत, कृष्ण माधव दुबे, हरिश्चंद्र शुक्ल, देवमणि शुक्ल, अमर नाथ तिवारी, लालजी ओझा मौजूद रहे।