सीतापुर। मैं सरायन हूं... लगभग पूरा सीतापुर शहर हमारे इर्द-गिर्द बसा है। किसी समय हमारे स्वच्छ जल स्रोतों से शहर वासी प्यास बुझाया करते थे। पवित्र घाटों पर स्नान ध्यान होता था। समय के साथ ही हमारी उपयोगिता कम होती चली गई। हैंड और इलेक्ट्रिक पंपों की भरमार होने के बाद से शहरवासियों ने हमारी तरफ ध्यान देना बंद कर दिया।
इतना ही नहीं बड़े-बड़े नालों के माध्यम से हमारी कोख में गंदा पानी उड़ेल कर बर्बादी की दास्तां भी गढ़नी शुरू कर दी। 12 बड़े नाले हमारी धार से सीधे मिले हैं, जो कि पूरे शहर की गंदगी बटोरकर हमारी कोख को भर रहे हैं। इस वजह से हमारे भंडार में गाद और काले पानी के अलावा कुछ नहीं दिखता है। हमारे उद्धार की योजनाएं तो कई बार बनी, लेकिन कागजों तक ही सीमित रही गईं। धरातल पर नहीं उतर सकीं।
करीब दो साल पहले तत्कालीन नगर विकास मंत्री शहर आए थे। उन्होंने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की थी और जलनिगम को ऐसा प्रोजेक्ट बनाने का निर्देश दिया था, जिससे हमें नालों के गंदे पानी से निजात मिल जाए। तत्कालीन भाजपा के जिला महामंत्री अचिन मेहरोत्रा को इस प्रोजेक्ट का प्रभारी नियुक्त किया था।
जल निगम ने पूरे शहर की नाप जोख करके सीवेज प्लान तैयार किया था। ट्रीटमेंट के लिए अकोइया गांव में प्लांट लगाने की योजना बनाई थी। तीन अरब से अधिक का प्रोजेक्ट बनाकर नगर विकास मंत्रालय को भेजा गया था। समय के साथ ही प्रोजेक्ट न जाने किस डस्टबिन में गुम हो गया है और आज भी हमारी कोख को शहर के डस्टबिन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। गुरुद्वारा, रोटी गोदाम, मछली मंडी आदि 12 बड़े नाले शहर की गंदगी बटोरकर हमारी कोख को भरे रहे हैं।
नगर विधायक बने थे भागीरथ
ऐसा नहीं है कि हमारी बदहाली पर पर्यावरण प्रेमियों का ध्यान नहीं गया। चुनाव जीतने के कुछ दिनों के बाद ही सदर विधायक राकेश राठौर हमारे लिए भागीरथ बने थे। उन्होंने रेलवे से लेकर कनवाखेड़ा के पुल तक सफाई का संकल्प लेकर काम शुरू कराया था। उन्होंने निर्जी खर्च पर हमारी कोख में जमी गाद को निकलवाया और तटबंध मजबूत कराए।
इससे हमें बहुत राहत मिली थी। गोपालघाट पुल से कैंची पुल के कुछ आगे तक हुई सफाई से हमारे बंद पड़े जलस्रोत खुल गए थे। हालांकि, तमाम अड़चनों की वजह से सदर विधायक का संकल्प पूरा नहीं हो पाया था। संसाधनों के अभाव में बीच में ही काम ठप हो गया था। अब देखो कब कोई हमारे लिए दोबारा भागीरथ बने।
2010 का निर्णय बना ताबूत में आखिरी कील
टिहरी डैम कमेटी के सदस्य रहे बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर नदी वैज्ञानिक डॉ. आरके चौधरी कहते हैं कि किसी नदी के जीवन के लिए एक निश्चित मात्रा में पानी रहना जरूरी है। वर्ष 2010 में भू माफिया के कहने पर एक सत्ताधारी नेता के दबाव में आकर प्रशासन ने हमारे प्रभाव को ही ले डाला। दरअसल, हमारे तटों पर प्लाटिंग का काम चल रहा था।
बाढ़ की वजह से लोग प्लाट नहीं खरीद रहे थे। ऐसे में भू माफिया ने सत्ता से साठगांठ करके हमारे जलस्रोत को ही बंद करा दिया। पहले बनबसा बैराज से हमारी कोख में पानी छोड़ा जाता था। इससे बाढ़ तो जरूर आती थी, लेकिन हमारी कोख में जमी गाद और कूड़ा साफ हो जाता था। वाटर लेवल बढ़ने से प्राकृतिक जलस्रोत खुल जाते थे। इससे हमारे भंडार में एक निश्चित मात्रा में पानी बना रहता था।
ऐसे तो खत्म हो जाएगा नदी का वजूद
सतीश का कहना है कि नदी तो दस वर्ष पहले थी। अब तो नाला बन गई है। नदी में गंदगी ही गंदगी है। तटों पर बदबू आती है। नजदीक जाने का मन नहीं करता। लवलेश ने बताया कि शहर के नाले नदी को तबाह किए दे रहे हैं। सरकार को नदी को नालों से मुक्त करने के लिए कुछ व्यवस्था करनी चाहिए। नहीं तो नदी का वजूद ही खत्म हो जाएगा।
सुरेश अवस्थी ने बताया कि सदर विधायक राकेश राठौर ने नदी सफाई के लिए अच्छी पहल की थी। इससे कुछ सुधार भी हुआ था। अभियान रुकने से नुकसान हुआ। रविराज सिंह का कहना है कि सरायन के उद्धार के लिए बड़े प्रयास की जरूरत है। नदी की हालत दयनीय हो चुकी है। सफाई के साथ ही नदी के तटों को अतिक्रमण मुक्त करना होगा।
तत्कालीन नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना की पहल पर शहर की ड्रेनेज व्यवस्था को दुरुस्त करते हुए नदी को बचाने के लिए तीन अरब रुपये से अधिक का प्रोजेक्ट बना था। इसे मंजूरी के लिए नगर विकास मंत्रालय भेजा गया था। इसके कुछ ही समय बाद सुरेश खन्ना का विभाग बदल गया। ऐसे में प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया। प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए अब फिर से कोशिश की जाएगी।
- अचिन मेहरोत्रा, भाजपा जिलाध्यक्ष
इस पर कोई यकीन नहीं करेगा कि हमने नदी की सफाई के लिए घर के जेवर तक बेच थे। निजी खर्चे पर पोकलैंड मशीन खरीदी थी और सफाई कराई थी। सरकार से सहयोग न मिलने के चलते हम अपने संकल्प को पूरा नहीं कर पाए और कार्य को बीच में ही बंद करना पड़ा। भविष्य में जब कभी हम सक्षम होंगे तो नदी का कायाकल्प करेंगे।
- राकेश राठौर, सदर विधायक