नैमिषारण्य। तीर्थनगरी नैमिषारण्य में आयोजित भागवत महाकुंभ के दौरान रविवार को कालीपीठ में ‘एक शाम राम के नाम-कैकेयी के राम’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ स्तंभकार, विचारक एवं विदेश व आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. रहीस सिंह ने ‘कैकेयी के राम’ विषय पर अपने विचार रखे। डॉ. सिंह ‘कैकेयी के राम’ पुस्तक के लेखक भी हैं।
उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन उनके पुरुषार्थ, त्याग, करुणा और मानवीय मूल्यों की यात्रा है। मानव रूप में श्रीराम ने अनेक कष्ट सहे, लेकिन हर परिस्थिति में मर्यादा की डोर थामे रखी और मानव जीवन के आदर्श स्थापित किए। उन्होंने कहा कि राम के जीवन में वनगमन का प्रसंग सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक पड़ावों में से एक है।
सामान्य लोकमानस में इस प्रसंग के कारण माता कैकेयी की छवि नकारात्मक रूप में देखी जाती है, जबकि राम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की पृष्ठभूमि में कैकेयी की भूमिका को व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कैकेयी के चरित्र को केवल दोष और नकारात्मकता तक सीमित करना उचित नहीं है। वनवास ने श्रीराम को राजमहल की सीमाओं से निकालकर ऋषियों, वनवासियों, निषादों और समाज के विभिन्न वर्गों से जोड़ा। इस दृष्टि से कैकेयी का निर्णय राम की जीवनयात्रा का पीड़ादायक, लेकिन निर्णायक उत्प्रेरक बनकर सामने आता है। उन्होंने कहा कि वनवास के बाद भी श्रीराम के मन में माता कैकेयी के प्रति सम्मान बना रहा।
ऐसे में केवल लोकधारणा के आधार पर कैकेयी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि श्रीराम की वनगमन यात्रा नर से नारायण और पुरुषार्थ की यात्रा है। इसमें दया, करुणा, मृदुता और त्याग के भाव दिखाई देते हैं। श्रीराम ने अपने जीवन में चमत्कार के बजाय पुरुषार्थ को महत्व दिया और प्रकृति तथा लौकिक जीवन से जुड़े रहे। उनका संदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश विद्यमान है और अपने पुरुषार्थ से वह ऐसे आदर्श स्थापित कर सकता है, जिनका समाज और राष्ट्र अनुसरण करें। उन्होंने कहा कि कौशल्या, कैकेयी, सीता, रावण और मंदोदरी सभी श्रीराम को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं, लेकिन राम एक ही हैं। उनकी पहचान मूल्यों और मर्यादा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से होती है।
कथा में माैजूद लोग
कथा में माैजूद लोग