मन की सानुकूलता ही सुख है। मन की प्रतिकूलता ही दु:ख है, इसलिए जरूरी है कि हम मन को वश में रखें। यह बात कथा प्रवक्ता चिदंबरानंद जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा में कही।
कथा में उन्होंने कहा कि भक्त के जीवन में जो मिला है, उसे सहर्ष स्वीकार कर लेने की मस्ती होनी चाहिए, जब हम प्रत्येक परिस्थिति में आनंद लेना सीख लेंगे तो वह आनंद हमसे कोई नहीं छीन सकेगा।
संसार में रहकर जब तक जीव अपनी लौकिक कामनाओं का त्याग नहीं करता है तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती। इसलिए अगर इच्छा करनी ही है तो ईश्वर की करनी चाहिए। दूसरी इच्छा तो दुख की जननी है।
व्यास जी कहते हैं कि ईश्वर की कृपा किसी पर कम या अधिक न होकर समान होती है, जब हमारी अपेक्षाएं, कामनाएं, एवं इच्छाएं बढ़ जाती है और उस कामनाओं की पूर्ति नहीं होती है तो हम कहते है कि परमात्मा की कृपा हम पर कुछ कम हो गई है।