नैमिषारण्य चक्रतीर्थ में डुबकी लगाते श्रद्धालु। संवाद
नैमिषारण्य। देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान विष्णु का पूजन करते हैं। इसके साथ चातुर्मास की शुरुआत भी होगी। साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर जप-तप व पूजन करेंगे। भगवान श्रीहरि के योगनिद्रा में जाने से मांगलिक कार्य थम जाएंगे। चार माह बाद 20 नवंबर को देवोत्थानी एकादशी पर भगवान विष्णु निद्रायोग से बाहर आएंगे, तब मांगलिक कार्यक्रमों का शुभारंभ होगा।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी, हरिशयनी, पद्मनाभा अथवा अषाढ़ी एकादशी के नाम से जाना जाता है। प्राचार्य प्रभाकर द्विवेदी ने बताया कि अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी तिथि का आरंभ 24 जुलाई को सुबह 09:13 बजे से होगा। यह तिथि 25 जुलाई को सुबह 11:35 बजे समाप्त होगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा। शास्त्रों में इस एकादशी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जो चार महीने तक चलता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। इस अवधि में जप, तप, दान, व्रत और भगवान विष्णु की आराधना का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। देवशयनी एकादशी का व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। चार माह बाद जब सूर्य तुला राशि में प्रवेश करते हैं तब देवोत्थानी एकादशी को भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं। देवोत्थानी एकादशी 20 नवंबर को है। इस दिन से रुके हुए मांगलिक कार्य फिर से प्रारंभ होते हैं।
बड़े महंत बजरंगदास ने बताया कि चातुर्मास में भगवान विष्णु पाताल लोक के राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं। राजा बलि ने इस अवधि में भगवान से अपने महल के द्वार पर रहने का वर मांगा था। महंत संतोष दास खाकी ने बताया कि चातुर्मास से संतों का भ्रमण रुक जाएगा। इस अवधि में संत एक जगह ठहरकर जप, तप, ध्यान करते हैं। संत इन चार महीनों में नदी और नाला पार नहीं करते हैं। एक ही जगह रहकर चातुर्मास व्यतीत करते हैं।