ऐशबाग-सीतापुर के बीच रेल सेवा बंद होने से मुसाफिर परेशान हैं। उनके जेब पर पहले की अपेक्षा तीन गुना से अधिक बोझ पड़ रहा है। कारण यह है कि रेल से जहां मुसाफिर 25 रुपये में लखनऊ पहुंच जाते थे। वहीं अब रोडवेज सफर में 86 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। जेब पर बोझ बढ़ने से कइयों का बजट बिगड़ गया है। इससे करीब छह हजार मुसाफिर परेशान हैं।
सीतापुर से लखनऊ रेलखंड पर आमान परिवर्तन का काम शुरू हो गया है। इसके चलते 15 मई से रेलवे की सेवाएं बंद हैं। मुसाफिरों को लखनऊ तक पहुंचने में दिक्कत न हो, इसके लिए रोडवेज की तरफ से अतिरिक्त रूप से करीब 125 बसें लगाई गई हैं, लेकिन इन बसों का किराए रेलवे की अपेक्षा तीन गुना से अधिक है।
मुसाफिरों को बस तो समय से मिल रही है लेकिन जेब पर भार अधिक पड़ रहा है। रेलवे से जहां मुसाफिर लखनऊ तक केवल 25 रुपये में पहुंच जाते थे। वहीं रोडवेज से अब इतनी ही दूरी तय करने में 86 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। इसके अलावा गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में लखनऊ में ऑटो रिक्शा का भी किराया वहन करना पड़ता है। इससे यात्री बेहद परेशान हैं।
यात्रियों का कहना है रोडवेज का किराया कम होना चाहिए। इतना अधिक बोझ महीने भर का बजट बिगाड़ रहा है। लखनऊ में एक निजी कंपनी में काम करने वाले आदित्य का कहना है छह हजार सैलरी मिलती है। ट्रेन में महीने भर की एमएसटी 350 में बन जाती है। अब अगर रोडवेज की बनवाए तो करीब 3200 रुपये देने पड़ेंगे। इसके अलावा अन्य किराए भी देने हाेंगे। सैलरी से कुछ नहीं बचेगा।
एमएसटी का कम हो किराया
रोडवेज को अपनी एमएसटी कम करनी चाहिए। इतनी अधिक होने से आर्थिक बोझ सहन करना मुश्किल हो रहा है। यही हालात रहे तो लखनऊ पहुंचना मुश्किल हो जाएगा।
-सौरभ मिश्र
सुविधाएं कम
रेलवे में जहां किराया कम था। वहीं सहूलियत भी रहती है। हर स्टेशन पर पानी सहित प्रसाधन की सुविधा मिलती है। वही रोडवेज में किराया अधिक वही सुविधाएं कम हैं।
-शिवम
किराए पर हो पुनर्विचार
रेलवे की अपेक्षा रोडवेज का किराया दोगुना से अधिक नहीं होना चाहिए। इतना किराया तो खर्च में समायोजित किया जा सकता है। रोडवेज को पुनर्विचार करना चाहिए।
-आदित्य
बदलनी होगी जॉब
हालात यह हो गए हैं कमाए क्या खाएं क्या। पूरी सैलरी किराए में ही खर्च हो जाएगी। इससे लखनऊ में जॉब करने को कोई मतलब नहीं रह जाएगा। जिले में ही जॉब की तलाशनी पड़ रही है।
-मोहित