इस संसार में न तो हनुमान जी से बड़ा कोई वक्ता है और नहीं उनसे बड़ा कोई श्रोता। जिसने भी पवनपुत्र की छत्रछाया में बैठकर भगवान की कथा कही या सुनी उन श्रोता और वक्ता दोनों का उद्धार हो जाता है।
यह बातें हनुमानगढ़ी पांच पांडव किला पर हनुमानगढ़ी के महंत बजरंगदास के सानिध्य में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान महंत रुक्मणि कांत ने कहीं।
मथुरा से पधारे कथा व्यास ने कहा कि जिस प्रकार सरिता किसी को भी जल उपयोग करने से मना नहीं करती, उसी प्रकार संत हमारे कल्याण के लिए कृपा बनाये रखते हैं।
बिना श्रद्धा के किया गया हवन और दिया गया दान कल्याण कारी नहीं होता है, सभी शुभ कर्म श्रद्धा पूर्वक ही करने चाहिये। पुरुषोत्तम मास में किया गया सत्कर्म और दान फल दायक होता है। कथा से पूर्व पवन दास ने कथा व्यास को अंगवस्त्र प्रदान कर अभिनन्दन किया।