सीतापुर। धीरे-धीरे परंपरागत सुगंधित देशी प्रजाति के धान विलुप्त हो रहे हैं। ऐसे में जिले के कुछ प्रगतिशील किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से बेहतर शुरुआत की है। इनके द्वारा देशी धान की खेती करने के साथ ही अन्य किसानों को जागरूक किया जा रहा है। जिले में करीब 100 हेक्टेयर में इसकी पौध लगाने और बोआई की तैयारी हो रही है।
खरीफ की फसल में इस बार 12 से अधिक प्रजाति के देशी धान की फसल उगाई जाएगी। जैसे विशुन पराग, इंद्रासन, लेंगुवा, रमबजरा, धनिया, अंजनी, रामगौध, मधुकर, काली धानी, लालमती, निंबुई, बेलर, मूंगफली, गौरिया प्रजाति की फसल होगी।
परंपरागत बीज विलुप्त होने से गांवों में नई-नई बीमारियां पनप रही हैं। हाईब्रिड फसलों की खेती होने से देशी धान को लोग भूलने लगे थे। गांजर क्षेत्र के रेउसा ब्लॉक के सिकोहा प्रगतिशील किसान श्वेतांक त्रिपाठी ने पुरातन देशी धान गांजर में पुर्नजीवित किया है। उन्होंने स्वयं 12 प्रजातियों के देशी धान का बीज तैयार किया है। इस बार वह 50 हेक्टेअर में इसकी खेती कराएंगे।
जिले भर में करीब सौ हेक्टेयर में देशी धान की खेती होगी। किसानों को बीज दिया जा चुका है। मिश्रिख ब्लॉक के दशरथपुर निवासी प्रगतिशील किसान कमलेश सिंह की ओर से प्राकृतिक खेती के तहत एक एकड़ में देशी धान की खेती की जा रही है। इसी प्रकार पहला ब्लॉक के भज्जूपुर चौड़िया निवासी प्रगतिशील किसान नीरज मिश्रा स्वयं इसकी खेती करने के साथ अन्य किसानों को प्रेरित कर रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि देशी प्रजाति के धान विभिन्न प्राकृतिक रूप और रंगों के होने कारण इसमें औषधीय गुण होते हैं। साथ ही इसमें कई पोषक तत्व होते हैं। औषधीय गुण होने के कारण राइस ब्रॉन आयल से चीन, अमेरिका जैसे देश तमाम दवाइयां बनाते हैं, वहीं इसकी अधिक मांग रहती है।