इष्टिका शिल्पकला की दुर्लभ व मन-मोहक करीगरी को दर्शाता आस्तिक बाबा मंदिर की प्रचाीन इमारतों के अब अवशेष ही बचे हैं। इस जगह को सहेजने के लिए पुरातत्व विभाग ने अपने सरंक्षण में भले ले लिया हो, पर यहां सिर्फ एक बोर्ड लगाने के अलावा अभी तक कुछ नही किया गया है।
लिहाजा, यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे जमींदोज होती जा रही है। सिधौली-मिश्रिख मार्ग के किनारे नहोइया गांव के करीब यह प्रचाीन मंदिर स्थित है। पुरातत्व विभाग भी इसे अवधक्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहर मानता है। इस मंदिर का निर्माण किसने कराया इसका कोई प्रमाण नही है। लेकिन पुरातत्व विभाग के अभिलेखों में 12वीं सदी में इसके निर्माण की बात दर्ज है।
मान्यता है, कि कभी यहां राजा मांधता का राज हुआ करता था। उसी दौरान राजा के पूर्वजों ने यह मंदिर बनवाया होगा। नक्काशीदार ईंटो से निर्मित यह मंदिर आस्तिक, इष्टिका अथवा अक्टीक बाबा के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर परिसर में दो बड़े व कई छोटे-छोटे मंदिर थे। जिनमें अब बड़े मंदिरों की दीवारें और छोटे मंदिरों की नींव ही बची है। मंदिर की ईंटो पर कुंडल, फूल व खुर बने हैं।
मंदिर में चंद्रशाल व पत्थर की आकर्षक मूर्तियां विराजित हैं। आज भी क्षेत्र के लोगों की इस मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा है। पूजा-अर्चना के अलावा नव दंपती यहां आशीर्वाद लेकर वैवाहिक जीवन की शुरुआत करते हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार इष्टिका शिल्पकला का यह दुर्लभ मंदिर अवधक्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहर है।
जिसे सहेजने को विभाग ने इसे सरंक्षित किया है। लेकिन रख-रखाव के अभाव में बचे अवशेष भी वक्त के साथ जमींदोज होते जा रहे हैं। दीवारें गिर रही हैं, और ज्यादातर मूर्तियां गायब हो चुकी हैं। अनदेखी का आलम यह कि पुरातत्व विभाग द्वारा लगाया गया बोर्ड भी जर्जर हो गया है। इस पर अंकित अधिकतर शब्द गुम हो गए हैं।
आस्तिक बाबा मंदिर के करीब एक विशाल टीला है। यह टीला भी अपने आप में ऐतिहासिक विरासत संजोए है। ग्रामीणों की मानें तो यहां राजा मांधता का किला हुआ करता था। पुरातत्व विभाग ने इस टीले पर भी अपने सरंक्षण का बोर्ड लगा रखा है। लेकिन आज तक टीले में दफन राज सामने लाने के प्रयास नहीं किए गए हैं।
आस्तिक बाबा मंदिर के बाकी अवशेष की देखरेख कर इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजा जा सकता है। पास के गांव नसीराबाद में रहने वाले बुजुर्ग इद्दा बताते हैं, कि हम लोग बचपन से मंदिर को इसी रूप में देखते आ रहे हैं। पूर्वजों से इसके बारे में बस कहानियां सुनी हैं, कि राजा मांधाता के पुरखों ने इसे बनवाया था। ग्रामीण डल्ला कहते हैं, कि इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जिससे बचे खंडहर भी देखरेख न होने से गिरते जा रहे हैं।