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मिश्रिख में पंचकोसी परिक्रमा शुरू

Sun, 20 Mar 2016 10:54 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सीतापुर
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84 कोसी परिक्रमा के मिश्रिख पहुंचने के साथ ही रविवार को पंच कोसी परिक्रमा शुरू हो गई। कूंच करते परिक्रमार्थी। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, सीतापुर
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रामनाम की गूंज के बीच मिश्रिख क्षेत्र से रविवार को पंच कोसी परिक्रमा शुरू हो गई। श्रद्धालुओं का उत्साह देख माहौल भी भक्तिमय हो गया। लोग रात-दिन लगातार चलकर परिक्रमा कर रहे हैं। मान्यता है कि जो लोग 84 कोसी परिक्रमा से वंचित रह जाते हैं, वह पंच कोसी परिक्रमा कर उतना ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। इस वजह से क्षेत्रीय लोगों की संख्या काफी अधिक है।  
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  शनिवार रात मिश्रिख पहुंचे रामादल ने 84 कोसी परिक्रमा पूरी कर ली। इस परिक्रमा के मिश्रिख पहुंचने के बाद ही पंच कोसी परिक्रमा प्रारंभ होती है। यही वजह है कि शनिवार रात से ही श्रद्धालु पंच कोसी परिक्रमा की तैयारी में जुट गए। महर्षि दधीचि कुंड में स्नान व पूजन के बाद श्रद्धालु पंच कोसी परिक्रमा पर निकले।

परिक्रमा की सबसे अहम बात यह है कि इस परिक्रमा को मिश्रिख में किसी भी स्थान से प्रारंभ कर सकते हैं। संतों व महंतों का कहना है कि इस परिक्रमा का पुण्य लाभ भी 84 कोसी परिक्रमा के समान है। इस वजह से क्षेत्रीय नागरिक अधिक संख्या में शामिल हैं।
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परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु भगवान श्रीराम के जयकारों के साथ विभिन्न देवी-देवताओं के जयकारे बोल रहे हैं। कोई दंडवत करते हुए परिक्रमा कर रहा है, तो कोई किसी को सहारा देकर परिक्रमा करवा रहा है। हर तरफ बस आस्था नजर आ रही है। मिश्रिख क्षेत्र में तकरीबन 20 किलोमीटर की परिधि में श्रद्धालुओं ने अपना डेरा जमा रखा है। बताया जाता है कि करीब पांच लाख श्रद्धालु मिश्रिख कस्बे में पहुंचे हैं।

जलभराव से निजात नहीं
प्रशासन सब कुछ दुरुस्त करवाने के दावे कर रहा है, लेकिन हकीकत उससे उलट है। मेला मैदान व मिश्रिख कस्बे के अन्य मैदानों पर जलभराव है। गंदा पानी जमा होने के कारण श्रद्धालुओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

84 कोसी छूटे तो करें पंच कोसी
संतों व महंतों का कहना है कि यदि किसी श्रद्धालु की 84 कोसी परिक्रमा छूट जाती है तो उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है। वह मिश्रिख क्षेत्र में पंच कोसी परिक्रमा कर पुण्य लाभ उठा सकता है।

मिश्रिख का महत्व मिश्रिख महर्षि दधीचि की नगरी है। जहां पर महर्षि दधीचि ने वृत्तासुर के संहार के लिए देहदान किया था। उनकी हड्डियों से ही वज्र बनाया गया जिससे वृत्तासुर का संहार किया गया। महर्षि दधीचि की तपस्थली होने के कारण इस धरती को बेहद पवित्र माना गया है। यहां पर महर्षि दधीचि ने जिस स्थान पर स्नान किया था। उसे दधीचि कुंड कहा जाता है। 
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