जिले में मनरेगा मजदूरों का हाल बेहद खराब है। इस योजना में पहले तो गांव में श्रमिकों को रोजगार नहीं मिलता। काम मिल भी जाता है तो महीनों तक मजदूरी भुगतान के लिए श्रमिक चक्कर लगाते हैं।
जबकि योजना में काम करने वाले मजदूरों को सात दिन में भुगतान कर दिए जाने का प्रावधान है। अफसरों की सुस्ती से जिले में सात करोड़ 25 लाख रुपये की मनरेगा मजदूरी पिछले दो साल से बकाया है। नतीजतन, मजदूरों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
गांवों में श्रमिकों को रोजगार मुहैय्या कराने के लिए केंद्र सरकार की ओर से मनरेगा योजना संचालित की जा रही है। योजना में श्रमिकों को सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है। इसके एवज में उन्हें तय मजदूरी दिए जाने का प्रावधान है। यह भुगतान मजदूरों के बैंक खाते में भेजा जाता है।
योजना का हाल इस कदर खराब है कि मनरेगा मजदूरों को काम मिलना बेहद टेढ़ी खीर साबित होता है। जिन मजदूरों को काम मिल गया तो उन्हें महीनों तक मजदूरी का भुगतान नहीं मिलता है। मौजूदा समय में जिले के सभी 19 ब्लॉकों में कुल मिलाकर करीब सात करोड़ का भुगतान बकाया है।
इसमें ब्लॉक एलिया में 25.89, बेहटा में 27.37, बिसवां में 37.86, गोंदलामऊ में 16.64, हरगांव में 32.45, कसमंडा में 66.76, खैराबाद में 39.03, लहरपुर में 21.01, मछरेहटा में 64.83, महमूदाबाद में 37.71, महोली में 10.07, मिश्रिख में 73.53, पहला में 7.11, परसेंडी में 29.25, पिसावां में 11.58, रामपुर मथुरा में 72.42, रेउसा में 6.65, सकरन में 68.88 तथा सिधौली में 32.67 लाख मजदूरी बकाया है। मनरेगा श्रमिक बकाया भुगतान पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं।